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शनिवार, 7 जनवरी 2012

"दर्द उभरता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


बस टीस सी उठती है, और दर्द उभरता है
भट्टी में पिघलकर ही, तो स्वर्ण निखरता है

सच्चाई अगर है तो, कुछ आँच नहीं आती
अग्नि की परीक्षा से, तो खोट ही डरता है

कलियुग हो या हो सतयुग, त्रेता हो या हो द्वापर
प्रह्लाद भक्त का तो, कुछ भी न बिगड़ता है

सच्ची लगन अगर हो, दिल में भी आग हो कुछ
उसका ही दो-जहाँ में, बस प्यार सँवरता है

आशिक है रूप का जो, मजनूँ वो क्या बनेगा
शीशा चटक गया तो, हरग़िज़ न सुधरता है 

"विनीत संग पल्लवी-सत्यकथा"

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना शास्त्री जी | आभार |

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच्चाई अगर है तो, कुछ आँच नहीं आती
    अग्नि की परीक्षा से, तो खोट ही डरता है.

    सटीक अभिब्यक्ति - वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बस टीस सी उठती है, और दर्द उभरता है
    भट्टी में पिघलकर ही, तो स्वर्ण निखरता है
    बहुत सुन्दर,

    उत्तर देंहटाएं
  4. शास्त्री जी,...आपके दर्द को मै समझ सकता हूँ,
    जाके पैर न फटे बेवाई,वो क्या जाने पीर पराई,
    मन के उठते भावनाओं की सुंदर प्रस्तुति,--काव्यान्जलि--जिन्दगीं--

    उत्तर देंहटाएं
  5. यह गीत बहुत दर्दीला है,
    नायक भी बहुत शर्मीला है.
    जिगर तो मुह में आता है
    पर शब्द नहीं कह पाता है.
    अन्दर ही अन्दर घुटता है,
    मन ही मन में तडपता है.
    देख के उसका निश्छल प्यार,
    देने को साथ हम हैं तैयार.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत बढ़िया रचना सर..
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बड़े ही नीतिपरक दोहे, सार गर्भित

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर रचना सर..

    समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी पधारने की कृपा किजियेगा..
    http://palchhin-aditya.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  9. सत्य तो अटल है उसको किसी भी कसौटी की जरूरत नहीं होती. बड़े नीतिपरक रचना है. कुछ सिखा जाती है आपकी कृति.

    उत्तर देंहटाएं
  10. वाह बहुत खूब. बेहद सुंदर भाव.

    उत्तर देंहटाएं
  11. वो टूटे आईने के सामने सजता-सँवरता है
    दरकते आईने की आह पर भी वाह करता है
    कभी शीशे के मन के आईने में झाँक कर देखो
    हृदय-भट्टी में जलता रूप,सोने सा निखरता है.
    धमनभट्टी में पिघला और शीशा बन के था निकला
    किसी अग्नि-परीक्षा से नहीं शीशा ये डरता है.

    आदरणीय शास्त्री जी, आपकी कविता की टीस ,दर्द और शीशे की चटकन ने मन को झकझोर कर रख दिया.मन में उपजे भावों को टिप्पणी के रूप में लिख दिया है.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर रचना शास्त्री जी | आभार |

    उत्तर देंहटाएं
  13. सच्चाई अगर है तो, कुछ आँच नहीं आती
    अग्नि की परीक्षा से, तो खोट ही डरता है
    इन दो वाक्यों में बहुत सच्चाई है..
    कितने लोग सचमुच समझते हैं..
    अफ़सोस ! बहुत कम !!
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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