|
हौसला रख कर कदम आगे धरो।
फासले इतने तो मत पैदा करो।।
चाँद तारों से भरी इस रात में,
मत अमावस से भरी बातें करो।
जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,
मत इसे जज्बात में रौंदा करो।
उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।
छोड़ दो शिकवों-गिलों की डगर को,
मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।
ज़िन्दगी है चार दिन की चाँदनी,
“रूप” पर इतना न तुम ऐंठा करो।
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
Linkbar
फ़ॉलोअर
रविवार, 6 अप्रैल 2014
"मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
"गीत-झुक गयी है कमर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
प्रीत
की पोथियाँ बाँचते-बाँचते,
झुक गयी
है कमर,
ढल गयी
है उमर।
फासलों
की फसल काटते-काटते,
झुक गयी
है कमर,
ढल गयी
है उमर।।
मन तो
है चिरयुवा,
तन
शिथिल पड़ रहा।
बूढ़ा
बरगद अभी,
जंग को लड़
रहा।
सुख की
सौगात को बाँटते-बाँटते,
झुक गयी
है कमर।
ढल गयी
है उमर।।
नेह की
आस में,
बातियाँ
जल रहीं।
वक्त
आया बुरा,
आँधियाँ
चल रहीं।
धुन्ध
को-धूल को छाँटते-छाँटते,
झुक गयी
है कमर,
ढल गयी
है उमर।।
झूठ की
रेल है,
सत्यता
है कहाँ?
नौनिहालों
में अब,
सभ्यता
है कहाँ?
ज्ञान
की गन्ध को बाँटते-बाँटते,
झुक गयी
है कमर,
ढल गयी
है उमर।।
देश
आजाद है,
पर अमन
हैं कहाँ?
मुस्कराता
हुआ,
अब चमन
हैं कहाँ?
ओस की
बून्द को चाटते-चाटते,
झुक गयी
है कमर,
ढल गयी
है उमर।।
ख्वाब
का नगमगी,
“रूप”
है अब कहाँ?
प्यार
की गुनगुनी,
धूप है
अब कहाँ?
खाई
अलगाव की पाटते-पाटते,
झुक गयी
है कमर,
ढल गयी
है उमर।।
|
शनिवार, 5 अप्रैल 2014
"दर्द की छाँव में मुस्कराते रहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
दर्द की छाँव में मुस्कराते
रहे
फूल बनकर सदा
खिलखिलाते रहे
हमको राहे-वफा में ज़फाएँ
मिली
ज़िन्दग़ी भर
उन्हें आज़माते रहे
दिल्लगी थी हक़ीक़त
में दिल की लगी
बर्क़ पर नाम उनका सजाते
रहे
जब भी बोझिल हुई
चश्म थी नींद से
ख़्वाब में वो सदा याद
आते रहे
पास आते नहीं, दूर
जाते नहीं
अपनी औकात हमको
बताते रहे
हम तो ज़ालिम मुहब्बत
के दस्तूर को
नेक-नीयत से पल-पल निभाते
रहे
जब भी देखा सितारों
को आकाश में
वो हसीं “रूप” अपना
दिखाते रहे
|
शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014
"ग़ज़ल-रूप” से ही प्यार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हर जगह पर हो रहा ईमान का व्यापार है
कंटकों ने ओढ़ ली, चूनर सुमन की चमन में
हाथ मत आगे बढ़ाना, बेध देगा ख़ार है
क्या खिलाएँ और खाएँ, है मिठासों में जहर,
ज़िन्दगी को मुँह चिढ़ाते, नाम के त्यौहार हैं
डाल पर बैठा परिन्दा, सोच में बैठा हुआ
खेत से दानों का, सारा मिट गया भण्डार है
अब नहीं बाकी बचा, कुछ भी फ़िजाओं में हुनर
शालीनता के भेष में, अश्लीलता दमदार है
दिल की कोटर में, छिपा बैठा मलिन-मन
मनचले भँवरे को केवल “रूप” से ही प्यार है
|
गुरुवार, 3 अप्रैल 2014
"गीत-तुमने सबका काज सँवारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
जल में-थल में,
नीलगगन में,
जो कर देता है
उजियारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।
कलियाँ चहक रही
उपवन में,
गलिया महक रही
मधुबन में,
कल-कल, छल-छल करती
धारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा
प्यारा-प्यारा।।
पंछी कलरव गान
सुनाते,
मेढक टर्र-टर्र
टर्राते,
खिला कमल, बनकर
अंगारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा
प्यारा-प्यारा।।
सूरज जन-जीवन को
ढोता,
चन्दा शीतल-शीतल
होता,
दोनो हरते हैं
अंधियारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा
प्यारा-प्यारा।।
कोई भूले अपने पथ
को,
रौशन करते सदा जगत
को,
तुमने सबका काज
सँवारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा
प्यारा-प्यारा।।
|
बुधवार, 2 अप्रैल 2014
"ग़ज़ल-संगी-साथी किसे बनाऊँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
कैसे अपने कदम
बढ़ाऊँ
जिससे मंजिल को पा
जाऊँ
दोराहे मन को
भटकाते
मुझको अपनी ओर
बुलाते
कैसे उलझन को
सुलझाऊँ
जिससे मंजिल को पा
जाऊँ
किसी डगर में नहीं
फूल हैं
भरे हुए भरपूर
शूल हैं
दुविधा है किसको
अपनाऊँ
जिससे मंजिल को पा
जाऊँ
मीठी वाणी बोल रहे
हैं
मेरा सुमन टटोल रहे
हैं
संगी-साथी किसे
बनाऊँ
जिससे मंजिल को पा
जाऊँ
लील गयी है चाँद
अमावस
लाऊँ कहाँ से उजली
पावस
कैसे में पथ को
चमकाऊँ
जिससे मंजिल को पा जाऊँ
|
मंगलवार, 1 अप्रैल 2014
"ग़ज़ल-पत्थरों को गीत गाना आ गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
फिर वही
मौसम सुहाना आ गया है
प्यार
करने का जमाना आ गया है
मुहब्बत
का असर होने लगा अब
पत्थरों
को गीत गाना आ गया है
मुद्दतों
से मौन में जो जी रहा था
सुमन को
बातें बनाना आ गया है
साज और
संगीत की सौगात पाकर
बेसुरों
को सुर लगाना आ गया है
आज फिर कलियाँ
हैं फूल जैसी
अब चमन
को खिलखिलाना आ गया है
जब हुई
रौशन शमा बाज़ार में
तन
पतिंगों को जलाना आ गया है
दिलजले
भी दिल्लगी करने लगे हैं
“रूप” का
ज़लवा पुराना आ गया है
|
लोकप्रिय पोस्ट
-
लगभग 24 वर्ष पूर्व मैंने एक स्वागत गीत लिखा था। इसकी लोक-प्रियता का आभास मुझे तब हुआ, जब खटीमा ही नही इसके समीपवर्ती क्षेत्र के विद्यालयों म...
-
दोहा और रोला और कुण्डलिया दोहा दोहा , मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) मे...
-
नये साल की नयी सुबह में, कोयल आयी है घर में। कुहू-कुहू गाने वालों के, चीत्कार पसरा सुर में।। निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने,...
-
समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि ...
-
आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
-
इन्साफ की डगर पर , नेता नही चलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा , उस ओर जा मिलेंगे।। दिल में घुसा हुआ है , दल-दल दलों का जमघट। ...
-
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
-
"चौपाई लिखिए" बहुत समय से चौपाई के विषय में कुछ लिखने की सोच रहा था! आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख। यहाँ ...
-
मित्रों! आइए प्रत्यय और उपसर्ग के बारे में कुछ जानें। प्रत्यय= प्रति (साथ में पर बाद में)+ अय (चलनेवाला) शब्द का अर्थ है , पीछे चलन...
-
“ हिन्दी में रेफ लगाने की विधि ” अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्र...






