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गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

"गीत-तुमने सबका काज सँवारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जल में-थल में, नीलगगन में,
जो कर देता है उजियारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

कलियाँ चहक रही उपवन में,
गलिया महक रही मधुबन में,
कल-कल, छल-छल करती धारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

पंछी कलरव गान सुनाते,
मेढक टर्र-टर्र टर्राते,
खिला कमल, बनकर अंगारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

सूरज जन-जीवन को ढोता,
चन्दा शीतल-शीतल होता,
दोनो हरते हैं अंधियारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।

कोई भूले अपने पथ को,
रौशन करते सदा जगत को,
तुमने सबका काज सँवारा।
सबकी आँखों को भाता है,
रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा।।



6 टिप्‍पणियां:

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