![]() सच्चाई में बल होता है,
झूठ पकड़ में है आ जाता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।
समझदार को मीत बनाओ,
नादानों को मुँह न लगाओ।
बैरी दानिशमन्द भला है,
राज़ न अपना उसे बताओ।
आसमान पर उड़नेवाला,
औंधे मुँह धरती पर आता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।
उससे ही सम्बन्ध बढ़ाओ,
प्रीत-रीत को जो पहचाने।
गिले भुलाकर गले लगाओ,
धर्म मित्रता का जो जाने।
मन के सागर में पलता है,
वफा-जफा का रिश्ता-नाता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।
शक्ल सलोनी, चाल घिनौनी,
मुख में राम, बगल में चाकू।
धर्म-गुरू का रूप बनाए,
लूट रहे जनता को डाकू।
मूषक का मन भरमाने को,
हर बिल्ला नाखून छिपाता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।
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शनिवार, 7 मई 2016
गीत "लूट रहे जनता को डाकू" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 5 मई 2016
दोहे "छाया का उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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झुलस रहा था बदन जब, दुनिया थी बेहाल।
गुलमोहर तब हो गया, गरमी खाकर लाल।।
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जितनी गरमी पड़ रही, उतना निखरा रूप।
खुश होता है गुलमुहर, खा कर निखरी धूप।।
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सड़क किनारे है खड़ा, केसरिया को धार।
सब लोगों को बाँटता, छाया का उपहार।।
--
गरम हवाएँ पी रहा, खुश हो करके सन्त।
जेठ मास में आ गया, मानो पुनः बसन्त।।
--
दुनियाभर को दे रहा, गुलमोहर उपदेश।
खुश हो करके मानिए, कुदरत का आदेश।।
--
सुख-दुख दोनों में रहो, हरदम एक समान।
जैसे सुख-दुख झेलता, निर्धन श्रमिक-किसान।।
--
बीज धरा में डालकर, कर लेता सन्तोष।
धरती के आगोश में, बढ़ता जाता कोष।।
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बाल कविता "लू-गरमी का हुआ सफाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 4 मई 2016
संस्मरण "पालतू जानवर सिर्फ पालतू ही नहीं होता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 3 मई 2016
अकविता "महाप्रयाण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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रेगिस्तान में
फँसे गधे की भाँति,
जिसमें मृग-मरीचिका के समान
उसे दिखाई देती है
पानी की पाँति,
जल की खोज में
इधर-उधर भागता रहता है,
रात में भी
जागता रहता है,
पानी का
होता तो है आभास,
परन्तु
बुझा नही पाता
अपनी प्यास,
वह चलता जाता है,
और चलता जाता है,
भवसागर से
अधूरी प्यास लिए
दुनिया से चला जाता है,
वह एक सन्देश,दे जाता है,
दुःख उठाते रहो,
जब तक देह में प्राण है,
शायद, जीवन का,
यही ‘‘महाप्रयाण’’ है।।
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सोमवार, 2 मई 2016
गीत "हो चुकी अब बन्दगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हर किसी की जिन्दगी है, बस अधूरी जिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ
से, हो चुकी अब बन्दगी।।
इक अधूरी प्यास को, सब साथ लेकर जायेंगे,
प्यार के नग़में कभी, फिर लौट कर नही आयेंगे,
काम अच्छे कर चलो, होगी नही शरमिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ
से, हो चुकी अब बन्दगी।।
कण्टकों की राह में, पत्थर गड़ेंगे पाँव में,
रात दिन चलना पड़ेगा, धूप में और छाँव में,
स्वर्ग होगा भाग्य में, या फिर नरक की गन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ
से, हो चुकी अब बन्दगी।।
जब चलेगी बात, गाँवों की गली में प्रीत की,
गुन-गुनायेगा कड़ी, जब कोई मेरे गीत की,
फिर कोई गुलशन खिलेगा, जी उठेगी जिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ
से, हो चुकी अब बन्दगी।।
हर किसी की जिन्दगी है, बस अधूरी जिन्दगी। बाँध लो बिस्तर जहाँ से, हो चुकी अब बन्दगी।। |
रविवार, 1 मई 2016
बालकविता "मौसम के शीतल फल खाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सूरज ने है रूप दिखाया।
गर्मी ने तन-मन झुलसाया।।
धरती जलती तापमान से।
आग बरसती आसमान से।।
लेकिन है भगवान कृपालू।
सबका रखता ध्यान दयालू।।
कुदरत ने फल उपजाये हैं।
जो सबके मन को भाये हैं।।
सूखी नदियों की रेती है।
लेकिन उनमें भी खेती है।।
ककड़ी-खीरा, खरबूजा हैं।
और रसीले तरबूजा हैं।।
रखते सबको सदा निरोगी।
नीम्बू पानी है उपयोगी।।
बेल और शहतूत निराले।
तन को ठण्डक देने वाले।।
नागर हो चाहे देहाती।
लीची सबको बहुत लुभाती।।
सेब-सन्तरा है गुणकारी।
पना आम का है हितकारी।।
मौसम के शीतल फल खाओ।
लू-गर्मी को दूर भगाओ।।
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