"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

लोड हो रहा है. . .

समर्थक

गुरुवार, 5 मई 2016

दोहे "छाया का उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

A Gulmohar Tree in Full Bloom on a Railway Platform!
झुलस रहा था बदन जब, दुनिया थी बेहाल।
गुलमोहर तब हो गया, गरमी खाकर लाल।।
--
जितनी गरमी पड़ रही, उतना निखरा रूप।
खुश होता है गुलमुहर, खा कर निखरी धूप।।
 --
सड़क किनारे है खड़ा, केसरिया को धार।
सब लोगों को बाँटता, छाया का उपहार।।
--
गरम हवाएँ पी रहा, खुश हो करके सन्त।
जेठ मास में आ गया, मानो पुनः बसन्त।।
--
दुनियाभर को दे रहा, गुलमोहर उपदेश।
खुश हो करके मानिए, कुदरत का आदेश।।
--
सुख-दुख दोनों में रहो, हरदम एक समान।
जैसे सुख-दुख झेलता, निर्धन श्रमिक-किसान।।
--
बीज धरा में डालकर, कर लेता सन्तोष।
धरती के आगोश में, बढ़ता जाता कोष।।
Gulmohar Tree at Chiplun Railway Station

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

टिप्पणियाँ ब्लॉगस्वामी के अनुमोदन पर ही प्रकाशित की जी सकेंगी।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails