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मंगलवार, 3 मई 2016

अकविता "महाप्रयाण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज मानव की स्थिति है
रेगिस्तान में
फँसे गधे की भाँति,
जिसमें मृग-मरीचिका के समान
उसे दिखाई देती है
पानी की पाँति,

जल की खोज में
इधर-उधर भागता रहता है,
रात में भी
जागता रहता है,

पानी का
होता तो है आभास,
परन्तु
बुझा नही पाता
अपनी प्यास,

वह चलता जाता है,
और चलता जाता है,
भवसागर से
अधूरी प्यास लिए
दुनिया से चला जाता है,

वह एक सन्देश,दे जाता है,
दुःख उठाते रहो,
जब तक देह में प्राण है,
शायद, जीवन का,
यही ‘‘महाप्रयाण’’ है।।  

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