![]() वही नदिया कहाती है, जहाँ जल में रवानी है
वहीं पर आचमन होता, जहाँ पर साफ पानी है
जवानों के ही बूते पर, वतन की आबरू होती
वहीं सब काम होते हैं, जहाँ क़ायम जवानी है
अभी बारूद-गोलों की, लगी है होड़ दुनिया में
फक़त असलाह के बल पर, जहाँ में पहलवानी है
अरे ओ आदमी! इन्सानियत के काम कर जाना
खुदी पर ही हुआ करती, खुदा की मेहरबानी है
सलामत “रूप” तो रहता नहीं है, कब्रगाहों में
गुज़र जाता है जब मंजर, तो रह जाती कहानी है
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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016
ग़ज़ल "खुदा की मेहरबानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016
दोहे "ले लो पाकिस्तान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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माँग रहा है देश अब, मोदी से उपहार।
विजयादशमी पर्व को, कर देना साकार।।
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कर दो पाकिस्तान को, नक्शे पर से साफ।
आतंकी इस देश को, अब मत करना माफ।।
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हर्ष और उल्लास के, अब हैं पर्व समीप।
तेल नहीं घी के जलें, दीवाली पर दीप।।
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सिंधुनदी-राबीनदी, झेलम और चनाब।
ये सब हिन्दुस्तान की, कहता इनका आब।।
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हिस्सा हिन्दुस्तान का, सिंध और पंजाब।
गिलगित से पख्तून से, आता यही जवाब।।
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ननकाना साहिब रहा, हमको आज पुकार।
नौशेरा लाहौर पर, कर लो अब अधिकार।।
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रावलपिण्डी-कराची, देती है आवाज।
कब्जा पाकिस्तान से, छोड़ो अरे नवाज।।
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पूरा पाकिस्तान मिल, भारत बने महान।
अपने कब्जे में करो, फिर से पाकिस्तान।।
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बुधवार, 5 अक्टूबर 2016
दोहे "कर दो काम तमाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
करते रहते समर में, जो जीवन संघर्ष।
होता उनके देश का, दुनिया में उत्कर्ष।।
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आदिकाल से ही रही, भारत की यह रीत।
भेद-भाव के बिना हम, करते सबसे प्रीत।।
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कालचक्र को देखकर, होते नहीं उदास।
इसीलिए तो देश का, उन्नत है इतिहास।।
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धरती को माता कहें, हम भारत के वीर।
प्राणों से प्यारा हमें, है अपना कश्मीर।।
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आजादी के समय जो, भूल कर गये लोग।
उसका ही परिणाम हम, आज रहे हैं भोग।।
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जिन्ना-नेहरू ने किया, विघटित हिन्दुस्तान।
पग-पग पर अब घेरता, हमको पाकिस्तान।।
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उचित समय अब आ गया, कर दो काम तमाम।
सीना छप्पन इंच का, कब आयेगा काम।।
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माटी से आने लगी, अब तो ये आवाज।
लहरा दो लाहौर में, अपना झण्डा आज।।
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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016
"जय-विजय पत्रिका अक्टूबर-2016 में मेरी ग़ज़ल प्रकाशित"
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भौंहें वक्र-कमान न कर
लक्ष्यहीन संधान न कर
ओछी हरक़त करके बन्दे
दुनिया को हैरान न कर
दीन-धर्म पर करके दंगे
ईश्वर का अपमान न कर
मन पर काबू करले प्यारे
दिल को बेईमान न कर
जल-जंगल से ही जीवन है
दोहन और कटान न कर
जो जनता को आहत करदे
ऐसे कभी बयान न कर
जिससे हो नुकसान वतन का
ज़ारी वो फ़रमान न कर
नहीं सलामत “रूप” रहेगा
सूरत पर अभिमान न कर
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सोमवार, 3 अक्टूबर 2016
वन्दना "अपना शीश नवाता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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शब्दों का भण्डार नहीं है, फिर भी कलम चलाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।
“रूप” नहीं है, रंग नहीं है,
भाव नहीं है, छन्द नहीं है।
कागज के कृत्रिम फूलों में,
कोई गन्ध-सुगन्ध नहीं है।
आड़ी-तिरछी रेखाओं से, अपनी फसल उगाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।
सिद्ध नहीं हूँ, सिद्धि नहीं है,
मस्तक तो है, बुद्धि नहीं है।
मिली मुझे बंजर वसुधा है,
जीवन तो है, ऋद्धि नहीं है।
अँखियों के खारे पानी को, मुखड़े पर ढलकाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।
भूखा सारा कुटुम-कबीला,
कंगाली में आटा गीला।
कालचक्र है जटिल जलेबी,
धरती के ऊपर नभ नीला।
झंझावातों की चक्की में, मैं तो पिसता जाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।
मैं हूँ साधक तेरा माता,
तन-मन से तेरा उद्गाता।
आया हूँ मैं द्वारे तेरे,
दूर करो अब संकट मेरे।
तेरे चरणों में माता, मैं अपना शीश नवाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।
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रविवार, 2 अक्टूबर 2016
दोहे "माता के नवरूप" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
इस भौतिक संसार में, माता के नवरूप।
रहती बारहमास ही, खिली रूप की धूप।।
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ज्ञानदायिनी शारदे, मन के हरो विकार।
मुझ सेवक पर कीजिए, इतना सा उपकार।।
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मेरे शब्दों को करो, माता जी साकार।
बिना आपके है नहीं, इनका कुछ आधार।।
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खाली झोली साथ है, मेला लगे उदास।
भर दो कंचन ज्ञान से, करता हूँ अरदास।।
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श्रोता बनकर आ गया, माता जी के द्वार।
वीणा की झंकार का, माँग रहा उपहार।।
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मेरी करुण पुकार पर, देना माता ध्यान।
पूजन-वन्दन का नहीं, मुझको कुछ भी ज्ञान।।
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ज्ञानदायिनी आप हो, सेवक है नादान।
छन्दों में भर दीजिए, माता सुर-लय-तान।।
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शनिवार, 1 अक्टूबर 2016
गीत "धान्य से भरपूर खेतों में झुकी हैं डालियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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धान्य से भरपूर, खेतों में झुकी हैं डालियाँ। धान के बिरुओं ने, पहनी हैं नवेली बालियाँ।। क्वार का आया महीना, हो गया निर्मल गगन, ताप सूरज का घटा, बहने लगी शीतल पवन, देवपूजन के लिए, सजने लगी हैं थालियाँ। धान के बिरुओं ने, पहनी हैं नवेली बालियाँ।। सुमन-कलियों की चमन में, डोलियाँ सजने लगीं, भ्रमर गुंजन कर रहे, शहनाइयाँ बजने लगीं, प्रणय-मण्डप में मधुर, बजने लगीं हैं तालियाँ। धान के बिरुओं ने, पहनी हैं नवेली बालियाँ।। |
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