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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

ग़ज़ल "खुदा की मेहरबानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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वही नदिया कहाती है, जहाँ जल में रवानी है
वहीं पर आचमन होता, जहाँ पर साफ पानी है

जवानों के ही बूते पर, वतन की आबरू होती
वहीं सब काम होते हैं, जहाँ क़ायम जवानी है

अभी बारूद-गोलों की, लगी है होड़ दुनिया में
फक़त असलाह के बल पर, जहाँ में पहलवानी है

अरे ओ आदमी! इन्सानियत के काम कर जाना
खुदी पर ही हुआ करती, खुदा की मेहरबानी है

सलामत “रूप” तो रहता नहीं है, कब्रगाहों में
गुज़र जाता है जब मंजर, तो रह जाती कहानी है


1 टिप्पणी:

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