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रविवार, 2 अक्तूबर 2016

दोहे "माता के नवरूप" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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इस भौतिक संसार में, माता के नवरूप।
रहती बारहमास ही, खिली रूप की धूप।।
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ज्ञानदायिनी शारदे, मन के हरो विकार।
मुझ सेवक पर कीजिए, इतना सा उपकार।।
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मेरे शब्दों को करो, माता जी साकार।
बिना आपके है नहीं, इनका कुछ आधार।।
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खाली झोली साथ है, मेला लगे उदास।
भर दो कंचन ज्ञान से, करता हूँ अरदास।।
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श्रोता बनकर आ गया, माता जी के द्वार।
वीणा की झंकार का, माँग रहा उपहार।।
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मेरी करुण पुकार पर, देना माता ध्यान।
पूजन-वन्दन का नहीं, मुझको कुछ भी ज्ञान।।
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ज्ञानदायिनी आप हो, सेवक है नादान।
छन्दों में भर दीजिए, माता सुर-लय-तान।।

2 टिप्‍पणियां:

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