अभिमानी इंसान से, कभी न करना प्रीत।
मुख पर चाहे हो लगा, कितना ही नवनीत।।
--
कपटी गाते हैं सदा, छल-फरेब के गीत।
चापलूस होते नहीं, कभी किसी के मीत।।
--
कामी-क्रोधी-लालची, होते आदमखोर।
ओछी गागर ही करे, सबसे ज्यादा शोर।।
--
केवल रसम अदायगी, दुनिया की है रीत।
यहाँ बनाना ठीक से, जाँच-परख कर मीत।।
--
कुन्दन तपकर आग में, नहीं बदलता रूप।
लेकिन खोटा माल तो, हो जाता विद्रूप।।
--
कंचन उतना निखरता, जितनी पड़ती चोट।
खरा कसौटी पर नही, कभी उतरता खोट।।
--
चटके घट से तो नहीं, बने सुरीला साज।
साबुत घड़ा कुम्हार का, देता है आवाज।।
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
Linkbar
फ़ॉलोअर
रविवार, 6 नवंबर 2016
दोहे "जाँच-परख कर मीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गीत "पर्व नया-नित आता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
क्रिसमस, ईद-दिवाली हो,
या छठपूजा, बोधित्सव हो,
महावीर स्वामी, गांधी के,
जन्मदिवस का उत्सव हो,
एक रहो और नेक रहो का
शुभसन्देश सुनाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।
उत्सव हैं उल्लास जगाते,
सूने मन के उपवन में,
खिल जाते हैं सुमन बसन्ती,
उर के उजड़े मधुवन में,
जीवन जीने की अभिलाषा,
को फिर से पनपाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।
भावनाओं की फुलवारी में
ममता, नेह जगाती है
रिश्तों-नातों की दुनिया,
साकार-सजग हो जाती है,
बहना के हाथों से भाई,
रक्षासूत्र बँधाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।
|
शनिवार, 5 नवंबर 2016
“पहाड़ी मनीहार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 4 नवंबर 2016
ग़जल "पहाड़ी की यही असली कहानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बनाये नीड़ हैं हमने, पहाड़ों के मचानों पर
उगाते फसल अपनी हम, पहाड़ों के ढलानों पर
मशीनों से नहीं हम हाथ से रोज़ी कमाते हैं
नहीं हम बेचते गल्ला, लुटेरों को दुकानों पर
बशर करते हैं अपनी ज़िन्दग़ी, दिन-रात श्रम करके
वतन के वास्ते हम जूझते, दुर्गम ठिकानों पर
हमारे दिल के टुकड़े, होटलों में माँजते बर्तन
बने दरबान कुछ लड़के, सियासत के मुकामों पर
पहाड़ी "रूप" की अपने, यही असली कहानी है
हमारी तो नहीं गिनती, चमन के पायदानों पर
|
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
दोहावली "अमन हो गया गोल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
अमर शहीदों का कभी, मत करना अपमान।
किया इन्होंने देशहित, अपना तन बलिदान।।
--
गुलदस्ते में अमन के, अमन हो गया गोल।
माली अपने चमन में, छिड़क रहा विषघोल।।
--
जनसेवक जब वतन में, करते उलटे काज।
फिर कैसे बन पायेगा, उन्नत देश-समाज।।
--
बिल्ले रखवाली करें, कुत्ते राग सुनाय।
अब तो अपने देश में, अन्धे राह बताय।।
--
मन पंछी उन्मुक्त है, इसकी बात न मान।
जीवन एक यथार्थ है, इसको लेना जान।।
--
रवि की किरणें दे रहीं, जग को जीवन दान।
पाकर धवल प्रकाश को, मत करना अभिमान।।
--
जीवन तो त्यौहार है, जानो इसका सार।
प्यार और मनुहार से, बाँटो कुछ उपहार।।
--
तम को हरने के लिए, खुद को रहा जलाय।
दीपक काली रात को, आलोकित कर जाय।।
--
सूखे रेगिस्तान में, बढ़ जाती है प्यास।
ख्वाबों के संसार में, रहता मनुज उदास।।
--
जो मन में हो आपके, लिखो उसी पर लेख।
बिना छंद तुकबन्दियाँ, बन जाती आलेख।।
|
बुधवार, 2 नवंबर 2016
गीत "चंचल “रूप” सँवारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बलखाती-लहराती उमड़ी, पर्वत से जल धारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल “रूप” सँवारा।।
बहती है उन्मुक्त भाव से, अपनी राह बनाती,
कलकल-छलछल करती, सबको मधुरिम राग सुनाती,
नदिया ने सिखलाया जग को, चरैवेति का नारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल “रूप” सँवारा।।
जब-जब कदम बढ़ाता राही, आगे को बढ़ जाता,
तालाबों का नीर, पंक के साथ सदा सड़ जाता,
बैठे-ठाले नहीं किसी को, देता कोई सहारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल “रूप” सँवारा।।
बिना नेह के सूखी बाती, कभी नहीं जलती है,
साहस-श्रम से ही तो, जीवन की नौका चलती है,
नाविक की पतवार चली, तो आया पास किनारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल “रूप” सँवारा।।
|
मंगलवार, 1 नवंबर 2016
दोहे "भइया-दोयज पर्व" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() यज्ञ-हवन करके बहन, माँग रही वरदान।
भइया का यमदेवता, करना शुभ-कल्याण।।
--
भाई बहन के प्यार का, भइया-दोयज पर्व।
अपने-अपने भाई पर, हर बहना को गर्व।।
--
तिलक दूज का कर रहीं, सारी बहनें आज।
सभी भाइयों के बने, सारे बिगड़े काज।।
--
रोली-अक्षत-पुष्प का, पूजा का ले थाल।
बहन आरती कर रही, मंगल दीपक बाल।।
--
एक बरस में एक दिन, आता ये त्यौहार।
अपनी रक्षा का बहन, माँग रही उपहार।।
--
जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक जीवित प्यार।
दौलत से मत तोलना, पावन प्यार-दुलार।।
|
लोकप्रिय पोस्ट
-
लगभग 24 वर्ष पूर्व मैंने एक स्वागत गीत लिखा था। इसकी लोक-प्रियता का आभास मुझे तब हुआ, जब खटीमा ही नही इसके समीपवर्ती क्षेत्र के विद्यालयों म...
-
दोहा और रोला और कुण्डलिया दोहा दोहा , मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) मे...
-
नये साल की नयी सुबह में, कोयल आयी है घर में। कुहू-कुहू गाने वालों के, चीत्कार पसरा सुर में।। निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने,...
-
समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि ...
-
आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
-
इन्साफ की डगर पर , नेता नही चलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा , उस ओर जा मिलेंगे।। दिल में घुसा हुआ है , दल-दल दलों का जमघट। ...
-
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
-
"चौपाई लिखिए" बहुत समय से चौपाई के विषय में कुछ लिखने की सोच रहा था! आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख। यहाँ ...
-
मित्रों! आइए प्रत्यय और उपसर्ग के बारे में कुछ जानें। प्रत्यय= प्रति (साथ में पर बाद में)+ अय (चलनेवाला) शब्द का अर्थ है , पीछे चलन...
-
“ हिन्दी में रेफ लगाने की विधि ” अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्र...


