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रविवार, 6 नवंबर 2016

दोहे "जाँच-परख कर मीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अभिमानी इंसान से, कभी न करना प्रीत।
मुख पर चाहे हो लगा, कितना ही नवनीत।।
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कपटी गाते हैं सदा, छल-फरेब के गीत।
चापलूस होते नहीं, कभी किसी के मीत।।
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कामी-क्रोधी-लालची, होते आदमखोर।
ओछी गागर ही करे, सबसे ज्यादा शोर।।
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केवल रसम अदायगी, दुनिया की है रीत।
यहाँ बनाना ठीक से, जाँच-परख कर मीत।।
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कुन्दन तपकर आग में, नहीं बदलता रूप।
लेकिन खोटा माल तो, हो जाता विद्रूप।।
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कंचन उतना निखरता, जितनी पड़ती चोट।
खरा कसौटी पर नही, कभी उतरता खोट।।
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चटके घट से तो नहीं, बने सुरीला साज।
साबुत घड़ा कुम्हार का, देता है आवाज।।

1 टिप्पणी:

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