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गुरुवार, 3 नवंबर 2016

दोहावली "अमन हो गया गोल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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अमर शहीदों का कभीमत करना अपमान।
किया इन्होंने देशहितअपना तन बलिदान।।
--
गुलदस्ते में अमन केअमन हो गया गोल।
माली अपने चमन मेंछिड़क रहा विषघोल।।
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जनसेवक जब वतन मेंकरते उलटे काज।
फिर कैसे बन पायेगाउन्नत देश-समाज।।
--
बिल्ले रखवाली करेंकुत्ते राग सुनाय।
अब तो अपने देश मेंअन्धे राह बताय।।
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मन पंछी उन्मुक्त हैइसकी बात न मान।
जीवन एक यथार्थ हैइसको लेना जान।।
--
रवि की किरणें दे रहींजग को जीवन दान।
पाकर धवल प्रकाश कोमत करना अभिमान।।
--
जीवन तो त्यौहार हैजानो इसका सार।
प्यार और मनुहार से, बाँटो कुछ उपहार।।
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तम को हरने के लिएखुद को रहा जलाय।
दीपक काली रात कोआलोकित कर जाय।।
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सूखे रेगिस्तान मेंबढ़ जाती है प्यास।
ख्वाबों के संसार मेंरहता मनुज उदास।।
--
जो मन में हो आपकेलिखो उसी पर लेख।
बिना छंद तुकबन्दियाँबन जाती आलेख।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. अमर शहीदों का कभी, मत करना अपमान।
    किया इन्होंने देशहित, अपना तन बलिदान।।
    जो मन में हो आपके, लिखो उसी पर लेख।
    बिना छंद तुकबन्दियाँ, बन जाती आलेख।।
    ..बहुत अच्छी सीख देती रचना

    उत्तर देंहटाएं

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