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चाचा नेहरू जी ने,
प्यारे बच्चों को ईनाम दिया था।
अपने जन्म-दिवस को
तुमने बाल-दिवस के नाम किया था।।
एक साल में एक बार ही
बाल दिवस आता है।
मास नवम्बर नेहरू जी की
हमको याद दिलाता है।।
चाचा नेहरू की पाकिट पर,
फूल गुलाब हमेशा रहता।
काँटों में भी मुस्काने की,
शुभ सन्देश सभी से कहता।।
फूलों जैसी मुस्कानों से,
महक रहा आजाद चमन।
बच्चों की किलकारी से है,
चहक रहा सारा आँगन।।
माली बनकर लाल जवाहर ने,
सींचा अपना उपवन।
अभिनव भारत के निर्माता
मेरे शत्-शत् तुम्हें नमन।।
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रविवार, 13 नवंबर 2016
बालकविता "चाचा नेहरू तुम्हें नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहे "कार्तिक पूर्णिमा-गंगास्नान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कातिक की है पूर्णिमा, सजे हुए हैं घाट।
सरिताओं के रेत में, मेला लगा विराट।।
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एक साल में एक दिन, आता है त्यौहार।
बहते निर्मल-नीर में, डुबकी लेना मार।।
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गंगा तट पर आज तो, उमड़ी भारी भीड़।
लगे अनेकों हैं यहाँ, छोटे-छोटे नीड़।।
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खिचड़ी गंगा घाट पर, लोग पकाते आज।
जितने भी आये यहाँ, सबका अलग मिजाज।।
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गुरू पूर्णिमा पर्व पर, खुद को करो पवित्र।
सरिताओं के घाट पर, आज नहाओ मित्र।।
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गुरु नानक का जन्मदिन, देता है सन्देश।
जीवन में धारण करो, सन्तों के उपदेश।।
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बुला रहा है आपको, हर-हर का हरद्वार।
मैली मत करना कभी, गंगा जी की धार।।
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गंगा जी के नाम से, भारत की पहचान।
करती तीनों लोक में, गंगा मोक्ष प्रदान।।
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शनिवार, 12 नवंबर 2016
दोहे "करो मदद हे नाथ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दाम गाँठ में है नहीं, महँगा है बाजार।।
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जमाखोर फैला रहे, मनगढ़न्त अफवाह।
जीवनयापन के लिए, कठिन हो रही राह।।
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पैसा पाने के लिए, होती खैंचातान।
सेवक अपने देश का, घूम रहा जापान।।
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कल तक तो सब ठीक था, अब मुशकिल हालात।
अब मजदूर-गरीब की, बिगड़ गयी है बात।।
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मुद्रा पर ये फैसला, बना अहम इतिहास।
परेशान सब लग रहे, आज आम औ’
खास।।
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बिना दवा रोगी मरें, कैसा है संयोग।
शादी और विवाह को, टाल रहे हैं लोग।।
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अफरातफरी है मची, सहमा हुआ समाज।
तरकारी बाजार में, सूनापन है आज।।
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बड़े नोट चलते नहीं, गायब छोटे नोट।
मारा-मारी हो रही, पसरी लूट-खसोट।।
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राजतन्त्र है झलकता, लोकतन्त्र में आज।
मनमाने अब देश में, लागू हुए रिवाज।।
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तानाशाही सी लगे, अपने मन की बात।
जनता की तो हो गयी, अब दिन में ही रात।।
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जुड़े करोड़ों नागरिक, मोदी जी के साथ।
मौजूदा हालात में, करो मदद हे नाथ।।
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शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
दोहे "दिन है देवोत्थान का, व्रत-पूजन का खास"
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भोग लगा कर ईश को, तब खोलो उपवास।।
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होते देवउठान से, शुरू सभी शुभ काम।
दुनिया में सबसे बड़ा, नारायण का नाम।।
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मंजिल की हो चाह तो, मिल जाती है राह।
आज रचाओ हर्ष से, तुलसी जी का ब्याह।।
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पूरी निष्ठा से करो, शादी और विवाह।
बढ़ जाता शुभ कर्म से, जीवन में उत्साह।।
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चलकर आये द्वार पर, नारायण देवेश।।
आयी है एकादशी, लेकर शुभ सन्देश।।
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खेतों में अब ईख ने, खूब सँवारा रूप।
खाने को मिल जायगा, नवमिष्ठान अनूप।।
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पावन-निर्मल हो गया, गंगा जी का नीर।
सुबह-शाम बहने लगा, शीतल-सुखद समीर।।
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गुरुवार, 10 नवंबर 2016
दोहे "दो हजार के नोट-रहे सवाल कचोट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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मिटा हजारी नोट का, सारा आज वजूद।
दो हजार का नोट अब, रहा जेब में कूद।।
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बन्द हजारी क्यों किया, किसकी थी ये राय।
दो हजार के नोट का, समझाओ अभिप्राय।।
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करो न ऐसे फैसले, जो हों नियम विरुद्ध।
छोटे नोटों का चलन, हो न जाय अवरुद्ध।।
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जिस काले धन के लिए, बन्द किये थे नोट।
जनता के मन को वही, रहे सवाल कचोट।।
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मजदूरी मजदूर की, जब हो एक हजार।
दो हजार के नोट पर, करते तभी विचार।।
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घुट-घुट कर हैं जी रहे, निर्धन-श्रमिक किसान।
धनवानों के लिए तो, राह हुई आसान।।
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धन के बल पर हों जहाँ, सारे आम चुनाव।
इसीलिए सरकार का, धन पर हुआ झुकाव।।
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"जय विजय मासिक पत्रिका के नवम्बर-2016 अंक में मेरी ग़ज़ल प्रकाशित"
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भूख के परिवेश में, गद्दार करते मस्तियाँ
इक महल के वास्ते, बर्बाद करदी बस्तियाँ
ज़ुल्मो-सितम के जोर पर, कब्जा किया पाताल में
कैसे सागर पर चलेंगी, गुर्बतों की कश्तियाँ
भीख में पाकर सियासत, मुल्क के मालिक हुए
करके मक्कारी इन्होंने बना ली हैं हस्तियाँ
नाम है जनतन्त्र लेकिन लोकशाही है कहाँ
झूठ ने सच की जला डाली समूची अस्थियाँ
“रूप” को अपने छिपाया, पहन कर खादी धवल,
चोर कितनी शान से लड़ने लगे हैं कुश्तियाँ
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बुधवार, 9 नवंबर 2016
दोहे "नोट पाँच सौ के हुए सभी पुराने बन्द" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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नोट पाँच सौ के हुए, सभी पुराने बन्द।
नये नोट सरकार के, अब देंगे आनन्द।।
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मुद्रा एक हजार की, आज हुई इतिहास।
दो हजार के नोट अब, रखना अपने पास।।
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पापी पाकिस्तान का, पात्र गया है फूट।
उग्रवाद-आतंक की, कमर गयी है टूट।।
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सही समय पर हो गया, जारी यह फरमान।
मुद्रा का अब देश की, बढ़ जायेगा मान।।
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अपनी धन-दौलत करो, जमा बैंक में जाय।
है काले धन के लिए, बचा न और उपाय।।
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बच पायेंगे अब नहीं, जमाखोर-मक्कार।
कैसे धन अर्जित किया, देखेगी सरकार।।
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सही सलामत बच गये, लोकतन्त्र में आम।
लेकिन खासम-खास का, होगा काम तमाम।।
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