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गुरुवार, 10 नवंबर 2016

दोहे "दो हजार के नोट-रहे सवाल कचोट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मिटा हजारी नोट का, सारा आज वजूद।
दो हजार का नोट अब, रहा जेब में कूद।।
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बन्द हजारी क्यों किया, किसकी थी ये राय।
दो हजार के नोट का, समझाओ अभिप्राय।।
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करो न ऐसे फैसले, जो हों नियम विरुद्ध।
छोटे नोटों का चलन, हो न जाय अवरुद्ध।।
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जिस काले धन के लिए, बन्द किये थे नोट।
जनता के मन को वही, रहे सवाल कचोट।।
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मजदूरी मजदूर की, जब हो एक हजार।
दो हजार के नोट पर, करते तभी विचार।।
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घुट-घुट कर हैं जी रहे, निर्धन-श्रमिक किसान।
धनवानों के लिए तो, राह हुई आसान।।
--
धन के बल पर हों जहाँ, सारे आम चुनाव।
इसीलिए सरकार का, धन पर हुआ झुकाव।।

1 टिप्पणी:

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