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जीवनसाथी के बिना, सूना है परिवार।।
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सजनी भगिनी-बेटियाँ, रखती सबका ध्यान।
कभी न करना चाहिए, नारी का अपमान।।
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शक्तिस्वरूपा नार है, माता का अवतार।
फिर भी सुनते हैं नहीं, इनकी लोग पुकार।।
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नारी के सम्मान का, करें आज संकल्प।
महिलाओं का जगत में, कोई नहीं विकल्प।।
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ममता का पर्याय है, दुनिया की हर नार।
नारी तेरे रूप को, नमन हजारों बार।।
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नारी की महिमा करूँ, कैसे आज बखान।
कम पड़ जाते शब्द हैं, करने को गुणगान।।
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नारायण से भी बड़ी, दुनिया में है नार।
कैसे भी हालात हों, नारी रहे उदार।।
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| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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बुधवार, 8 जनवरी 2020
दोहे "माता का अवतार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
सोमवार, 6 जनवरी 2020
संस्मरण "दादी अम्मा" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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बात सत्तावन साल पुरानी है हमारे पड़ोस में एक वृद्ध महिला रहती थी। जिसको पूरा मुहल्ला अम्मा के नाम से पुकारता था, लेकिन उनका नाम हरदेई था।
उन दिनों हमने एक गइया पाली हुई थी। घर में हम लोग सुबह गुड़ के साथ मट्ठा पी लिया करते थे। और माता जी उसके लिए घास लेने चली जातीं थी। उस समय मेरी अवस्था 12 साल की थी। बाल मन था अतः मन में विचार आया कि माता जी के आने से पहले क्यों न कढ़ी और चावल बना लिया जाये।
बस फिर क्या था मैंने जितनी समझ थी उसके अनुसार अपना काम शुरू कर दिया। और कढ़ी में छौंक लगा दिया। तभी वो वृद्ध महिला जिसको हम अम्मा कहा करते थे उधर से गुजरी और और बड़े कौतूहल से मेरे क्रिया-कलापों को देखने लगी। अब मुझे क्या पता था कि कढ़ी में कितना बेसन घोलना चाहिए?
अम्मा ने मुझे कहा- “रूपचन्द बेटा क्या कर रहा है?”
मैंने कहा- “अम्मा कढ़ी बना रहा हूँ।“
अम्मा ने जब चमचा कढ़ाई में चला कर देखा तो हँसने लगी और बोली बेटा कब तक पकायेगा इस पानी को। इसमें बेसन तो बहुत कम डाला है तूने।
मैंने कहा- “अम्मा मुझे क्या पता कि कितना बेसन डालते हैं।“
तब अम्मा ने कहा- “तू अब पास में मेरे पास में बैठकर देखता जा। मैं तुझे सिखाती हूँ कढ़ी बनाना।“
अम्मा ने कुछ बेसन और घोलकर कढ़ाई में मिला दिया। आधे घंटे में कढ़ी बन गयी तब अम्मा ने चावल बीन कर चावल भी पका दिये और बड़े प्यार से मुझे खाना खिलाया।
आज मैं जब भी कढ़ी-चावल बनाता हूँ तो बरबस ही अम्मा की याद आ जाती है।
ऐसा नहीं कि अम्मा सिर्फ मेरी ही मदद करती थी। वो तो पूरे मुहल्ले में सबकी मदद करती थी।
मट्ठे में रोटी मलकर गली के कुत्ते खिलाना तो उसका रोज का काम था। इस काम में उसके पति कन्हैया दादा उसकी भरपूर मदद करते थे।
मैंने अम्मा को अपने जीवन काल में कभी क्रोधित होते हुए नहीं देखा था। लेकिन उस रोज तो कमाल ही हो गया। जब एक मनचला एक जवान लड़की पर फब्तियाँ कस रहा था।
अम्मा से रहा न गया और अपनी छड़ी से उसने मनचले की पिटायी कर दी।
उसका नाम तो हरदेई था मगर वो वाकई में सबकी अम्मा थी।
“जीवन के जो बच्चों को, कर्म सदा सिखलाती है।
ममता जिसके भीतर होती, माता वही कहाती है।।"
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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रविवार, 5 जनवरी 2020
संस्मरण "मेरी गुरुकुल की पहली यात्रा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)
शुक्रवार, 3 जनवरी 2020
संस्मरण "बाबा नागार्जुन और चालबाज कवि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"संस्मरण-बाबा नागार्जुन"
स्कूटर से यात्रा करते हुए डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', बाबा नागार्जुन और वाचस्पति शर्मा।
बाबा
नागार्जुन की तो इतनी स्मृतियाँ मेरे मन व मस्तिष्क में भरी पड़ी हैं कि एक
संस्मरण लिखता हूँ तो दूसरा याद हो आता है। मेरे व वाचस्पति जी (तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष-राजकीय महाविद्यालय,
खटीमा) के एक चाटुकार मित्र थे। जो वैद्य जी के नाम से मशहूर थे। वे अपने नाम के
आगे ‘निराश’ लिखते थे। अच्छे शायर माने जाते थे।
आजकल तो दिवंगत हैं। परन्तु धोखा-धड़ी और झूठ
का व्यापार इतनी सफाई व सहजता से करते थे कि पहली बार में तो कितना ही चतुर
व्यक्ति क्यों न हो उनके जाल में फँस ही जाता था।
उन दिनों बाबा नागार्जुन का प्रवास खटीमा में
ही था। यहाँ डिग्री कॉलेज में वाचस्पति जी हिन्दी के प्राध्यापक थे। इसलिए
विभिन्न कालेजों की हिन्दी विषय की कापी उनके पास मूल्यांकन के लिए आती थीं। उन
दिनों चाँदपुर के कालेज की कापियाँ उनके पास आयी हुईं थी।
तभी की बात है कि दिन में लगभग 2 बजे एक सज्जन वाचस्पति जी का घर पूछ रहे थे।
उन्हें वैद्य जी टकरा गये और राजीव बर्तन स्टोर पर बैठ कर उससे बातें करने लगे।
बातों-बातों में यह निष्कर्ष निकला कि उनके पुत्र का हिन्दी का प्रश्नपत्र अच्छा
नही गया था। इसलिए वो उसके नम्बर बढ़वाने के लिए किन्ही वाचस्पति प्रोफेसर के
यहाँ आये हैं।
वैद्य जी ने छूटते ही कहा- "प्रोफेसर
वाचस्पति तो मेरे बड़े अच्छे मित्र हैं। लेकिन वो एक नम्बर बढ़ाने के एक सौ
रुपये लेते हैं। आपको जितने नम्बर बढ़वाने हों हिसाब लगा कर उतने रुपये दे
दीजिए।"
बर्तन वाला राजीव यह सब सुन रहा था। उसकी
दूकान के ऊपर ही वाचस्पति जी का निवास था और वह उनका परम भक्त था।
राजीव चुपके से अपनी दूकान से उठा और पीछे
वाले रास्ते से आकर वाचस्पति जी से जाकर बोला- ‘‘सर जी! आप भी 100
रु0 नम्बर के हिसाब से ही परीक्षा में नम्बर बढ़ा
देते हैं क्या?’’
और उसने अपनी
दुकान पर हुई पूरी घटना बता दी।
वाचस्पति जी ने राजीव से कहा- "जब वैद्य
जी! चाँदपुर से आये व्यक्ति का पीछा छोढ़ दें, तो उस व्यक्ति को मेरे पास बुला लाना।"
इधर वैद्य जी ने 10 अंक बढ़वाने के लिए चाँदपुर वाले व्यक्ति से
एक हजार रुपये ऐंठ लिए थे।
बाबा नागार्जुन भी राजीव और वाचस्पति जी की
बातें ध्यान से सुन रहे थे।
थोड़ी ही देर में वैद्य जी वाचस्पति जी के घर
आ धमके। इसी की आशा हम लोग कर रहे थे। पहले तो औपचारिकता की बातें होती रहीं।
फिर वैद्य जी असली मुद्दे पर आ गये और कहने लगे कि मेरे छोटे भाई चाँदपुर में
रहते हैं। सुना है कि आपके पास चाँदपुर के कालेज की हिन्दी की कापियाँ जाँचने के
लिए आयीं है। आप प्लीज मेरे भतीजे के 10 नम्बर बढ़ा दीजिए।
वाचस्पति जी ने कहा- ‘‘वैद्य जी मैं यह व्यापार नही करता हूँ।’’
तब तक राजीव चाँदपुर वाले व्यक्ति को भी लेकर
आ गया।
हम लोग तो वैद्य जी से कुछ बोले नही। परन्तु बाबा नागार्जुन ने वैद्य जी की क्लास
लेनी शुरू कर दी। सभ्यता के दायरे में जो कुछ भी कहा जा सकता था बाबा ने
खरी-खोटी के रूप में वो सब कुछ वैद्य जी को सुनाया।
अब बाबा ने चाँदपुर वाले व्यक्ति से पूछा- ‘‘आपसे इस दुष्ट ने कुछ लिया तो नही है।’’
तब 1000 रुपये वाली बात सामने आयी।
बाबा ने जब तक उस व्यक्ति के 1000 रुपये वैद्य
जी से वापिस नही करवा दिये तब तक वैद्य जी का पीछा नही छोड़ा।
बाबा ने उनसे कहा- ‘‘वैद्य जी अब तो यह आभास हो रहा है कि तुम जो
कविताएँ सुनाते हो वह भी कहीं से पार की हुईं ही होंगी। साथ ही वैद्य जी को
हिदायत देते हुए कहा-
"अच्छा साहित्यकार बनने से पहले
अच्छा व्यक्ति
बनना बहुत जरूरी है।"
कुछ अपनी कहना और कुछ उनकी सुनना!
बाबा के पास लोगों के मिलने का ताँता लगा रहता था!
सारा परिवार बाबा के साथ बहुत खुश रहता था!
मेरे पिता जी श्री घासीराम आर्य
और दोनों पुत्रों के साथ बाबा घूम भी लेते थे!
बच्चों से तो बाबा बहुत घुल-मिल जाते थे!
इस दौरान कई कवि गोष्ठिया भी
बाबा के् सम्मान में आयोजित की गईं!
बाबा को शॉल और मालाओं से
सम्मानित भी तो किया गया था!
मुझे आज भी याद है कि खटीमा बस स्टेशन पर
मैं ही बाबा को दिल्ली की बस में बैठाने आया था!
यह है बाबा का पत्र मेरे नाम
जो उन्होंने दिल्ली से मुझे लिखा था!
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गीत "हो रहा विहान है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
हो रहा विहान है, रश्मियाँ जवान हैं,
पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।।
मतकरो कुतर्क कुछ, सत्य स्वयं सिद्ध है,
हौसले से काम लो, पथ नहीं विरुद्ध है,
यत्न से सँवार लो, उजड़ रहा वितान है।
पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।।
मनुजता की नीड़ में, विषाद ही विषाद हैं,
धर्म प्रान्त-जाति के बढ़ रहे विवाद हैं,
एकता अखण्डता का, रो रहा विधान है।
पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।।
चोटियों से शैल की, हिम रहा सतत पिघल,
पंक में खिला कमल, खोजता है स्वच्छ जल,
मनुजता की आज तो, लुट रही दुकान है।
पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।।
वाटिका का हर सुमन, गन्ध को लुटा रहा,
चाँद अपनी चाँदनी से, ताप को घटा रहा,
नव विहान छेड़ता, नित्य नयी तान है।
पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।।
स्वाभिमान कह रहा, दम्भ मत उधार लो,
वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो,
बेदिलों के दिलों को, अब सुमन बनाइए,
बस यही उपाय है, बस यही निदान है।
पर्वतों की राह में, चढ़ाई है ढलान है।।
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गुरुवार, 2 जनवरी 2020
दोहे "महँगाई की मार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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महँगाई ने कर दिये, कीर्तिमान सब ध्वस्त।
निर्धन जनता के हुए, आज हौसले पस्त।।
पूरी दुनिया में चला, मन्दी का है दौर।
लेकिन अपने देश में, महँगाई का ठौर।।
हा-हाकार मचा हुआ, दुर्लभ मिट्टीतेल।
मार रसोईगैस की, लोग रहे हैं झेल।।
लाभ कमाती तेल में, भारत की सरकार।
फिर क्यों जनता झेलती, महँगाई की मार।।
सत्ताधारी शान से, सुना रहे फरमान।
महँगाई से त्रस्त हैं, निर्धन-श्रमिक-किसान।।
सबजी और अनाज के, बढ़े हुए हैं भाव।
अब तक भी आया नहीं, कीमत में ठहराव।।
अब बिल्ली के गले में, घण्टी बाँधे कौन।
आँखें सब कुछ बोलती, अधर हो गये मौन।।
मजबूरी में कर रहा, भूखे प्राणायाम।
महँगाई पर है नहीं, अब तक लगी लगाम।।
जब से आयी देश में, बहुमत की सरकार।
महँगाई के सामने, जनता है लाचार।।
हालत अब भी है वही, आया नूतन साल।
कैसे फिर नववर्ष में, सुधरेंगे अब हाल।।
आशंकाएँ हैं बहुत, मन में बहुत सवाल।
करते हैं यह कामना, शुभ हो नूतन साल।।
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बुधवार, 1 जनवरी 2020
गीत "है नये साल का अभिनन्दन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गये साल को है प्रणाम!
है नये साल का अभिनन्दन।।
लाया हूँ स्वागत करने को
थाली में कुछ अक्षत-चन्दन।।
है नये साल का अभिनन्दन।।
--
गंगा की धारा निर्मल हो,
मन-सुमन हमेशा खिले रहें,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के,
हृदय हमेशा मिले रहें,
पूजा-अजान के साथ-साथ,
होवे भारतमाँ का वन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।
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नभ से बरसें सुख के बादल,
धरती की चूनर धानी हो,
गुरुओं का हो सम्मान सदा,
जन मानस ज्ञानी-ध्यानी हो,
भारत की पावन भूमि से,
मिट जाए रुदन और क्रन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।
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नारी का अटल सुहाग रहे,
निश्छल-सच्चा अनुराग रहे,
जीवित जंगल और बाग रहें,
सुर सज्जित राग-विराग रहें,
सच्चे अर्थों में तब ही तो,
होगा नूतन का अभिनन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।
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