वक्त के साथ बदलना सीखो कायदे से जरा चलना सीखो रास्ते खुद-ब-खुद मिल
जायेंगे घर से बाहर तो निकलना
सीखो जलना पड़ता है रौशनी के लिए शम्मा जैसा तो पिघलना
सीखो आदमीयत को अपनी पहचानों हौसला रखके सँभलना सीखो तू-तू, मैं-मैं न करो अपनों से उम्र के साथ में ढलना
सीखो बे-वजहा क्यों गुरूर करते
हो बुरे जज्बात कुचलना सीखो खोल दो अब तो बन्द दरवाजे खुली हवा में टहलना सीखो जीत जाओगे भरोसा रक्खो हार कर हाथ न मलना सीखो "रूप" पर इतना
क्यों इठलाते हो प्यार की आग में जलना सीखो -- |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
Linkbar
फ़ॉलोअर
सोमवार, 6 जून 2022
नौशेरी ग़ज़ल "कायदे से जरा चलना सीखो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 5 जून 2022
दोहे "खास आज भी खास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहों में ही निहित है, जीवन का भावार्थ। गरमी में अच्छे लगें, शीतल पेय पदार्थ।। ज्यादा मीठे माल से, हो जाता मधुमेह। कभी-कभी तो चाटिए, कुछ तीखा अवलेह।। हमने दुनिया को दिया, कविताओं का ढंग। किन्तु विदेशों का चढ़ा, आज हमीं पर रंग।। राम और रहमान को, भुना रहे हैं लोग। जनता दुष्परिणाम को, आज रही है भोग।। वर्तमान है लिख रहा, अब अपना इतिहास। आम आज भी आम है, खास आज भी खास।। बढ़ जाता है हौसला, जब हो जाती जीत। मन में अगर उमंग हो, बज उठता संगीत। अगर इरादे नेक हों, होती नहीं थकान। सादा भोजन भी लगे, मानो हो पकवान।। जिनके मिलने से मिले, मन को खुशी अपार। ऐसे सज्जनवृन्द तो, मिलने अब दुश्वार।। लोगों ने देखा जहाँ, बेलन-तवा-परात। अपनी चादर को बिछा, वहीं गुजारी रात।। लोगों को जब शहद की, मिल जाती है गन्ध। बिना किसी अनुबन्ध के, हो जाते सम्बन्ध।। अच्छे कामों में सदा, आते हैं अवरोध। चूहें-छिपकलियाँ करें, रवि का बहुत विरोध।। |
शनिवार, 4 जून 2022
दोहे "लेखक ऐसे उग रहे, जैसे खर-पतवार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जिसमें रंग हजार हों, वही प्यार का रोग। अब तो मतलब के लिए, प्यार जताते लोग।। -- अपने निश्चय पर अडिग, रहता जो इनसान। मंजिल को पाना उसे, है बिल्कुल आसान।। -- सरल शब्द का कीजिए, कविता में उपयोग। जटिल काव्य को आजकल, नहीं पढ़ेंगे लोग।। -- जो दिल से निकले वही, कहलाता है भाव। उन भावों का काव्य में, अब हो रहा अभाव।। -- नवयुग में साहित्य का, बहुत बुरा है हाल। नेह-नीर के बिन सभी, सूख रहे हैं ताल।। -- मुखपोथी के खेत में, बैठे दावेदार। लेखक ऐसे उग रहे, जैसे खर-पतवार।। कुछ कविता के चोर हैं, कुछ हैं दोहाखोर। जालजगतपर आज तो, मथनी है कमजोर।। -- माणिक-मोती खोजने, चले थामकर डोर। अब चुल्लूभर नीर में, डूबे गोताखोर।। -- |
सत्रहशेरी ग़ज़ल "प्यार से झेलना वक्त की मार को" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जीत में है बदलना मिली हार को प्यार से झेलना वक्त की
मार को भूलना मत कभी भी मददगार
को दिल से खैरात दे देना हकदार
को -- हौसला दिल में रखना हमेशा
जवां जंग लगने न देना है हथियार
को -- अड़चनें आयें जब भी कभी राह
में दिल से तजना नहीं नगमगी प्यार
को -- जिन्दगी में कभी सुख हैं दुख
हैं कभी फूल जैसा समझना सदा खार
को -- मसले सारे यकीनन सुलझ
जायेंगे बन्द करना नहीं आस के द्वार
को -- एक शम्मा जलाकर तो देखो
कभी रौशनी मात दे देगी अँधियार
को -- एक और नेक बनकर है रहना
हमें घर में तामीर करना ना दीवार
को -- जो है पीता जहर वो महादेव
है थामता वो ही गंगा की जलधार
को -- जो भी कोशिश में कोताही
करता नहीं वो ही हाँ में बदलना है इनकार
को -- साज को जो बजाता है तरतीब
से वो नहीं छेड़ता है गलत तार
को -- इक इशारे पे बरबाद हो
जाओगे मत चुनौती कभी देना दरबार
को -- दिल में जो हो उसे खुलके कह
दीजिए क्यों दबाते दिलों में
हो अबसार को -- बच नहीं पायेगा कोई कानून
से न्याय देगा सजा जब गुनहगार
को -- चाल काबू में रख ले अरे
आदमी ब्रेक तो दीजिए तेज रफ्तार
को -- चाल चलते रहो वक्त के साथ
में सादगी से करो रोज सिंगार
को -- हुस्न पर इतना अभिमान मत
कीजिए "रूप" देता हवा
जुल्फ-रुखसार को -- |
शुक्रवार, 3 जून 2022
भूमिका, "कृष्णायन संजीवनी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
भूमिका उदात्त भावनाओं की अभिव्यक्ति "कृष्णायन संजीवनी" आज अचानक आभासी दुनिया के मेरे मित्र कवि अशोक कुमार मिश्र जी मेरे निवासस्थान पर पधारे। उनसे मिलकर ऐसा लगा कि जैसे हम वर्षों से एक दूसरे को जानते हैं। यद्यपि उनके आने का प्रयोजन नैमित्तिक ही था। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का भावरूपान्तरण दोहा छन्द में किया है। जिसकी पाण्डुलिपि को आद्यन्त तक बाँच कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि स्वतन्त्र रूप से काव्य सृजन करना जितना सरल है उतना ही किसी कृति की विषय वस्तु का रूपान्तर करना बहुत कठिन और दुष्कर कार्य है। किन्तु कवि अशोक कुमार मिश्र जी ने इसे सम्भव कर दिखाया है। उदाहरण के लिए- श्लोक - 2.22 वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यानि संयाति नवानि
देही।। श्लोक
का भाव रूपान्तरण देखिए- "जीर्णवस्त्र जिमि त्याग नर,
पहने नये नवीन। वैसे ही सुन जीव भी, त्यागे
देह मलीन।। अन्य-अन्य तन प्राप्त कर, जाता
नूतन देह। अर्जुन ऐसा जान लो, करो
नहीं सन्देह।।" इसी अध्याय के
एक अन्य श्लोक के भाव रूपान्तर का भी अवलोकन कर लीजिए- श्लोक 2.47 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47। -- "रखो कर्म अधिकार तुम,
करो न फल का ध्यान। कर्मों के फल हेतु का, करना मत
गुणगान।। कर्महीन रहना नहीं, करो न
ऐसा भान। अर्जुन ऐसे कर्म में, तेरा है
कल्यान।।"
विद्वान दोहाकार अशोक कुमार मिश्र ने अध्याय 10 के
श्लोकों का बहुत ही भावपूर्ण रूपान्तरण सशक्तरूप से किया है। देखें- उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥२७॥ -- "अश्वों में उच्चैश्रवा,
अमिय संग उत्पन्न। अर्जुन ऐसा मान ले, मैं ही
हूँ सम्पन्न।। सभी गजों में श्रेष्ठ मैं, ऐरावत
ही मान। नर उत्तम मैं ही सुनो, राजा
बहुत महान।।" इसी क्रम में
अध्याय 11 के निम्न श्लोक का भी अवलोकन कर लीजिए- अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम पश्यामि त्वां सर्वतोअनंतरूपम। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।16। -- "जग के स्वामी आपकी, बहुत भुजा मुख नैन। उदर बहुत सब ओर से, देख हुआ
बेचैन।। रूप दिखे प्रभु आपके, जिनका
आदि न अन्त। सकलरूप में मध्य भी, दिखे
नहीं भगवन्त।।" यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।18.5। -- "यज्ञ दान तप कर्म का,
कभी करो मत त्याग। यही कर्म नित कर्म हैं, रखो सदा
अनुराग।। यज्ञ दान तप कर्म को, नर करते
जो जान। शुचितामय जीवन करें, ऐसा लो संज्ञान।।" साहित्य की दो
विधाएँ हैं गद्य और पद्य, जो साहित्यकार की देन होती हैं
और वह समाज को दिशा प्रदान करती हैं, जीने का मकसद बताती
हैं।
जहाँ कथाकारों ने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज को कुछ न कुछ प्रेरणा
देने का प्रयास किया है। वहीं पद्यकारों ने भी अपने काव्य के माध्यम से समाज को
दिशा देने का प्रयास किया है। "कृष्णायन संजीवनी" भी एक ऐसा ही प्रयोग है। जो दोहाकार अशोक
कुमार मिश्र की कलम से निकला है। इस दोहा संग्रह के शीर्षक की सार्थकता इसी में
है कि यह श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का भाव रूपान्तर दोहा छन्द में है।
इस प्रकार मैं यह देखता हूँ कि दोहाकार अशोक कुमार मिश्र जी ने भाषिक
सौन्दर्य के अतिरिक्त दोहा छन्द की सभी विशेषताओं का संग-साथ लेकर जो निर्वहन
किया है,
वह अत्यन्त सराहनीय है।
मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक अशोक कुमार मिश्र जी के दोहों से अवश्य
लाभान्वित होंगे और उनकी "कृष्णायन संजीवनी" दोहा कृति समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय
सिद्ध होगी। हार्दिक शुभकामनाओं के साथ- समीक्षक (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') कवि एवं साहित्यकार टनकपुर-रोड, खटीमा जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308 मोबाइल-7906360576 Website. http://uchcharan.blogspot.com/ E-Mail . roopchandrashastri@gmail.com |
गुरुवार, 2 जून 2022
ग़ज़ल "बगावत भी करे कैसे, यहाँ दो जून की रोटी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हमारे देश में मजदूर की, किस्मत हुई खोटी मयस्सर है नहीं ढंग से, उन्हें दो जून की रोटी दलाली में लगे हैं आज, अपने देश के सेवक बगावत भी करे कैसे, वहाँ दो जून की रोटी करे क्या झोंपड़ी फरियाद, महलों की मिनारों से हमेशा ही रही कंगाल, है दो जून की रोटी जो ढोते ईंट भट्टे पर, निवाला हाथ में रखकर नहीं थाली में खाते हैं, कभी दो जून की रोटी हमारे देश में लाखों, सिकन्दर बीनते कूड़ा तभी मिलती है मुश्किल से, उन्हें दो जून की रोटी बुढ़ापा आ गया उनको, पकौड़े तल के खोखे में सभी की चाय से चलती नहीं, दो जून की रोटी हुनर को देखता ही कौन है, दौलत की दुनिया में हमेशा ‘रूप’ को मिलती, जहाँ दो जून की रोटी |
बुधवार, 1 जून 2022
ग़ज़ल "दो जून की रोटी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
ज़रूरत बढ़ गई इतनी, हुई है ज़िन्दग़ी खोटी। बहुत मुश्किल जुटाना है, यहाँ दो जून की रोटी।। नहीं ईंधन मयस्सर है, हुई है गैस भी महँगी, पकेगी किस तरह बोलो, यहाँ दो जून की रोटी। बहुत ऊँचे हुए हैं भाव, अब तो दाल-आटे के, गरीबी में हुई भारी, यहाँ दो जून की रोटी। अज़ब अन्धेर नगरी है, टके की कुछ नहीं कीमत, हुई है जान से महँगी, यहाँ दो जून की रोटी। लगा है “रूप” का मेला, मुखौटों की नुमायश है, मिली अस्मत के बदले में, यहाँ दो जून की रोटी। |
लोकप्रिय पोस्ट
-
लगभग 24 वर्ष पूर्व मैंने एक स्वागत गीत लिखा था। इसकी लोक-प्रियता का आभास मुझे तब हुआ, जब खटीमा ही नही इसके समीपवर्ती क्षेत्र के विद्यालयों म...
-
दोहा और रोला और कुण्डलिया दोहा दोहा , मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) मे...
-
नये साल की नयी सुबह में, कोयल आयी है घर में। कुहू-कुहू गाने वालों के, चीत्कार पसरा सुर में।। निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने,...
-
समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि ...
-
आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
-
इन्साफ की डगर पर , नेता नही चलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा , उस ओर जा मिलेंगे।। दिल में घुसा हुआ है , दल-दल दलों का जमघट। ...
-
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
-
"चौपाई लिखिए" बहुत समय से चौपाई के विषय में कुछ लिखने की सोच रहा था! आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख। यहाँ ...
-
मित्रों! आइए प्रत्यय और उपसर्ग के बारे में कुछ जानें। प्रत्यय= प्रति (साथ में पर बाद में)+ अय (चलनेवाला) शब्द का अर्थ है , पीछे चलन...
-
“ हिन्दी में रेफ लगाने की विधि ” अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्र...





