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खुद को खुदा
समझ रहा, इंसान आज तो
मुट्ठी में है
सिमट गया जहान आज तो
कैसे सुधार हो
भला, अपने समाज का
कौड़ी के मोल
बिक रहा, ईमान आज तो
भरकर लिबास आ
गये, शेरों का भेड़िए
सन्तों के भेष में
छिपे, हैवान आज तो
जिसको नहीं है
इल्म वो इलहाम बाँटता
उड़ता बग़ैर
पंख के नादान आज तो
अब लोकतन्त्र
में हुई कौओं की मौज़ है
चिड़िया का घोंसला
हुआ सुनसान आज तो
ज़न्नत के
ख़्वाब को दिखा उपदेश बेचते
चलने लगी अधर्म
की दुकान आज तो
सन्तों को
सुरक्षा की ज़रूरत है किसलिए?
बौना हुआ है
देश का विधान आज तो
मिलते हैं सभी
ऐश के सामान जेल में
किस्मत से मिल गया यहाँ, भगवान आज तो
है नाम राम का मगर रावण के काम हैं
मुश्किल हुई है
“रूप” की पहचान आज तो
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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शुक्रवार, 21 नवंबर 2014
"ग़ज़ल-मुश्किल हुई है रूप की पहचान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
गुरुवार, 20 नवंबर 2014
"मातृशक्ति-कुछ दोहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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लालन-पालन में दिया, ममता और दुलार।
बोली-भाषा को सिखा, माँ करती उपकार।।
हर हालत में जो रहे, कोमल और उदार।
पत्नी-बेटी-बहन का, नारी देती प्यार।।
मत अबला कहना कभी, मातृशक्ति बलयुक्त।
कभी नहीं हो पायेंगे, इसके ऋण से मुक्त।।
होता है सन्तान का, सीधा है सम्वाद।
माता को करते सभी, दुख आने पर याद।।
जगदम्बा के रूप में, रहती है हर ठाँव।
माँ के आँचल में सदा, होती सुख की छाँव।।
नारायण से भी बड़ी, नारी की है जात।
सृजन कर रही सृष्टि का, इसीलिए है मात।।
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बुधवार, 19 नवंबर 2014
"बालगीत-माता की ममता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
- माँ को नमन करते हुए!
- माता के उपकार बहुत,वो भाषा हमें बताती है!उँगली पकड़ हमारी माता,चलना हमें सिखाती है!!दुनिया में अस्तित्व हमारा,माँ के ही तो कारण है,खुद गीले में सोकर,वो सूखे में हमें सुलाती है!उँगली पकड़ हमारी……..देश-काल चाहे जो भी हो,माँ ममता की मूरत है,धोकर वो मल-मूत्र हमारा,पावन हमें बनाती है!उँगली पकड़ हमारी……..पुत्र कुपुत्र भले हो जायें,होती नही कुमाता माँ,अपने हिस्से की रोटी,बेटों को सदा खिलाती है!उँगली पकड़ हमारी……..ऋण नही कभी चुका सकता,कोई भी जननी माता का,माँ का आदर करो सदा,यह रचना यही सिखाती है!उँगली पकड़ हमारी……
मंगलवार, 18 नवंबर 2014
"शब्द सरिता में मेरी रचना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शब्द सरिता में मेरी रचना
हिन्दीभाषा को अपनायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।।
हिन्दीवालों की हिन्दी ही-
क्यों इतनी कमजोर हो गयी?
भाषा डूबी अंधियारे में,
अंग्रेजी की भोर हो गई।
एक वर्ष में पन्द्रह दिन ही-
हिन्दी की गाथा को गायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।१।
चीरहरण करते भाषा का,
ये काले अंग्रेज निरन्तर।
भेद-भाव की करतूतों से,
छेद रहे माता का अन्तर।
संविधान को धता बताकर,
ये मनमाने ढोल बजायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।२।
जो जन-जन का राजदुलारा,
उसको है इण्डिया बनाया।
अपने को इण्डियन बताकर,
भारतीयता को बिसराया।
खाकर के स्वदेश का राशन,
गान विदेशों का ये गायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।३।
मत माँगे हिन्दी भाषा में,
लोगों को विश्वास दिलाया।
लेकिन संसद में जाकर के,
गिटर-पिटर का सुर अपनाया।
आगामी निर्वाचन में हम,
नेताओं को धरा दिखायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।४।
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सोमवार, 17 नवंबर 2014
"ग़ज़ल-उलझ गया है ताना-बाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]() नहीं रहा अब समय पुराना
ख़ुदगर्ज़ी
अब हुआ ज़माना
कैसे बुने कबीर चदरिया
उलझ
गया है ताना-बाना
पसरी
है सब जगह मिलावट
नकली पानी
नकली दाना
देशभक्त
हैं दुखी देश में
लूट
रहे मक्कार खज़ाना
आजादी
अभिशाप बन गयी
हुआ
बेसुरा आज तराना
दीन-धर्म
के फन्दे में है
मानवता
का अब अफसाना
“रूप”
देखकर दे देते वो
हमें भीख में कुछ नज़राना
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रविवार, 16 नवंबर 2014
"गीत-पराक्रम जीवन में अपनाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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मक्कारों
से हो मक्कारी, गद्दारों से गद्दारी।
तभी
सलामत रह पायेगी, खुद्दारों की खुद्दारी।।
दया
उन्हीं पर दिखलाओ, जो दिल से माफी माँगें,
कुटिल-कामियों
को फाँसी पर, जल्दी से हम टाँगें,
ऐसा
बने विधान देश का, जिसमें हो खुद्दारी।
तभी
सलामत रह पायेगी, खुद्दारों की खुद्दारी।।
ऊँचा
पर्वत-गहरा सागर, हमको ये बतलाता है,
अटल
रहो-गम्भीर बनो, ये सीख हमें सिखलाता है.
डर कर
शीश झुकाना ही तो, खो देता है खुद्दारी।
तभी सलामत
रह पायेगी,
खुद्दारों की खुद्दारी।।
तुम
प्रताप के वंशज हो, उनके जैसा बन जाओ तो,
कायरता
को छोड़, पराक्रम
जीवन में अपनाओ तो,
याद
करो निज आन-बान को, आ जायेगी खुद्दारी।
तभी
सलामत रह पायेगी, खुद्दारों की खुद्दारी।।
कंकड़
का उत्तर हमको, पत्थर से ही देना होगा,
नीति
यही कहती, अब दुश्मन से लोहा लेना होगा,
निर्भय
होकर दिखलानी ही होगी अपनी खुद्दारी।
तभी
सलामत रह पायेगी, खुद्दारों की खुद्दारी।।
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शनिवार, 15 नवंबर 2014
"ग़ज़ल-फासले इतने तो मत पैदा करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
फासले इतने तो मत पैदा करो।।
चाँद तारों से भरी इस रात में,
मत अमावस से भरी बातें करो।
जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,
मत इसे जज्बात में रौंदा करो।
उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।
छोड़ दो शिकवों-गिलों की बात अब,
मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।
ज़िन्दगी है चार दिन की चाँदनी,
“रूप” पर इतना न तुम ऐंठा करो।
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