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बुधवार, 20 मई 2015
मंगलवार, 19 मई 2015
प्यार के दोहे "जीवन का विज्ञान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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ढाई आखर में छिपा,
जीवन का विज्ञान।
माँगे से मिलता
नहीं, कभी प्यार का दान।।
--
प्यार नहीं है
वासना, ये तो है उपहार।
दिल से दिल का मिलन
ही, होता है आधार।।
--
रोज शाम को पार्क
में, मिलते कितने यार।
किन्तु नहीं उमड़ा
कभी, आँखों में वो प्यार।।
--
प्यार न देखे रूप
को, प्यार देखे जात।
आँखों-आँखों में
करे, मन तो मन की बात।।
--
मन ही मन के जानता,
छिपे हुए उद्गार।
जो नैसर्गिकरूप से
उमड़े, वो है प्यार।।
--
अनजाने को देख कर,
आँख हो गयीं चार।
अँखियन में तब
प्यार को, देखा पहली बार।।
--
तोता-तोती भी करें, प्यार-प्रीत की बात।
दोनों ही सहला रहे, इक-दूजे का गात।।
--
कभी जुदाई है यहाँ, कभी यहाँ पर मेल।
हैं संयोग-वियोग का, प्यार अनोखा खेल।।
-♥♥♥-
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सोमवार, 18 मई 2015
दोहे "नहीं समय अनुकूल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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जो समाज को
दिशा दे, वो ही है साहित्य।
दोहों में
मेरे नहीं, होता है लालित्य।१।
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पहले पंजा
गर्व में, रहता था मग़रूर।
जनता ने अब कर
दिया, उसके मद को चूर।२।
--
आज हो गया कमल
भी, अपने मद में चूर।
जनता ही फिर
करेगी, भ्रम उसका भी दूर।३।
--
जनता के है
हाथ में, दल-दल की तकदीर।
धूल चाटते समर
में, बड़े-बड़े बलवीर।४।
--
होता वो
जनतन्त्र में, जो जनता को भाय।
दिल्ली में इक
तिफ़्ल को, कुर्सी दई थमाय।५।
--
रास न आया
किसी को, हाथ हो गया साफ।
तीन सीट में
कमल है, सढ़सठ में है आप।।
--
जनता धोखा खा
गयी, मान रही अब भूल।
फूलों के बदले
वहाँ, मिले आज हैं शूल।६।
--
अगले आम चुनाव
में, होंगे फिर बदलाव।
देखें किस दल
की यहाँ, पार लगेगी नाव।७।
--
जिह्वा पर
प्रभु नाम हो, लेकिन मन में खोट।
भाषण के बल पर
मिलें, जनता के अब वोट।८।
--
करें चाकरी
देश में, महासुभट विद्वान।
धनवानों की माँद में, बन्धक हैं गुणवान।९।
--
निर्धन-श्रमिक
किसान के, नहीं समय अनुकूल।
अभी दिखाई दे
रहा, मौसम भी प्रतिकूल।१०।
--
दिखा नहीं है
जेठ में, बदन जलाता घाम।
उमड़-घुमड़कर
आ रहे, गरमी में घनश्याम।।
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सावन-भादों
में लगें, अच्छी हमें फुहार।
चौमासे में हे
प्रभू, कर देना उपकार।११।
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रविवार, 17 मई 2015
दोहे "श्रद्धासुमन लिए हुए लोग खड़े हैं आज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
अच्छे दिन के
स्वप्न तो, हुए बहुत अब दूर।
दाम तेल के
बढ़ रहे, महँगाई भरपूर।।
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शक्कर-घी
महँगा हुआ, महँगा आटा-तेल।
शासक सत्ता
मोह में, खेल रहा है खेल।।
--
सबको अच्छे
दिनों के, खूब दिखाये स्वप्न।
राज-पाट को
पाय कर, सबको किया विपन्न।।
--
समझे थे सब
लोग यह, होगा कोउ कमाल।
लेकिन हालत
देख कर, होता बहुत मलाल।।
--
राम-राम के
नाम पर, पाया रावणराज।
निर्धनभक्तों
के यहाँ, बिगड़े सारे काज।।
--
केशर-क्यारी
में चली, साठ-गाँठ भरपूर।
पुनर्वास के ख़्वाब़
तो, अब नयनों से दूर।।
--
एक साल में
देख कर, बदले हुए मिज़ाज़।
श्रद्धासुमन
लिए हुए, लोग खड़े हैं आज।।
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गीत "कुटी बनायी नीम पर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
पहले छाया बौर, निम्बौरी अब आयीं है नीम पर।
शाखाओं पर गुच्छे बनकर, अब छायीं हैं नीम पर।।
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मेरे पुश्तैनी आँगन में खड़ा हुआ ये पेड़ पुराना,
शीतल छाया देने वाला, लगता हमको बहुत सुहाना,
झूला डाल बालकों ने भी पेंग बढ़ाई नीम पर।
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डाली-डाली पर फिरती है, उछल-कूद करती जाती है,
करने को आराम रात को, कोटर इसे बहुत भाती है,
एक गिलहरी बच्चों के संग, रहने आयी नीम पर।
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बिजली करती आँख-मिचौली, गर्मी बहुत सताती है,
इसके नीचे खाट डालकर, नींद चैन की आती है.
कौए-चिड़ियों ने भी अपनी कुटी बनायी नीम पर।
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शनिवार, 16 मई 2015
गीत "सबकी कुछ मजबूरी होगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक')
दबी हुई कस्तूरी होगी।
दिल की बात नहीं कह पाये,
कुछ तो बात जरूरी होगी।।
सूरज-चन्दा जगमग करते,
नीचे धरती, ऊपर अम्बर।
आशाओं पर टिकी ज़िन्दग़ी,
अरमानों का भरा समन्दर।
कैसे जाये श्रमिक वहाँ पर,
जहाँ न कुछ मजदूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।
मुट्ठी में है सारी दुनिया,
मोबाइल सब काम कर रहा।
चिट्ठी-पत्री का युग बीता,
पत्रालय आराम कर रहा।
ऊहापोह भरे जीवन में,
सबकी कुछ मजबूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।
हर मुश्किल का समाधान है,
सुख-दुख का चल रहा चक्र है।
लक्ष्य दिलाने वाला पथ तो,
कभी सरल है, कभी वक्र है।
चरैवेति को भूल न जाना,
चलने से कम दूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।
अरमानों के आसमान का,
ओर नहीं है, छोर नहीं है।
दिल से दिल को राहत होती,
प्रेम-प्रीत पर जोर नहीं है।
जितना चाहो उड़ो गगन में,
चाहत कभी न पूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।
रूप-रंग पर गर्व न करना,
नश्वर काया, नश्वर माया।
बरगद-पीपल-नीम पथिक को,
देता हरदम शीतल छाया।
साजन से ही तो सजनी की,
सजी माँग सिन्दूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।
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शुक्रवार, 15 मई 2015
दोहे "करो आज शृंगार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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जिनके घर के
सामने, खड़ा हुआ है नीम।
उनके घर आता
नहीं, जल्दी वैद्य-हकीम।।
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प्राणवायु
देते हमें, बरगद-पीपल नीम।
भूल रहे हैं
आज सब, पुरखों की तालीम।।
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नीम घोटकर
पीजिए, हुआ अगर मधुमेह।
हो जायेगी
आपकी, रोगीदेह-सुदेह।।
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पेड़ नीम का झेलता,
पीड़ा चुपचाप।
देता शीतल
छाँव को, हरता सबके ताप।।
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खाली पड़ी
जमीन पर, बने हुए हैं कक्ष।
दिखलाई देते
नहीं, अब आँगन में वृक्ष।।
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हरा-भरा
परिवेश ही, है सच्चा उपहार।
पेड़ लगा कर
धरा का, करो आज शृंगार।।
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शस्य-श्यामला
धरा हो, जीवन रहे निरोग।
पर्यावरण
बचाइए, मिलकर सारे लोग।।
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