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सोमवार, 18 मई 2015

दोहे "नहीं समय अनुकूल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो समाज को दिशा दे, वो ही है साहित्य।
दोहों में मेरे नहीं, होता है लालित्य।१।
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पहले पंजा गर्व में, रहता था मग़रूर।
जनता ने अब कर दिया, उसके मद को चूर।२।
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आज हो गया कमल भी, अपने मद में चूर।
जनता ही फिर करेगी, भ्रम उसका भी दूर।३।
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जनता के है हाथ में, दल-दल की तकदीर।
धूल चाटते समर में, बड़े-बड़े बलवीर।४।
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होता वो जनतन्त्र में, जो जनता को भाय।
दिल्ली में इक तिफ़्ल को, कुर्सी दई थमाय।५।
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रास न आया किसी को, हाथ हो गया साफ।
तीन सीट में कमल है, सढ़सठ में है आप।।
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जनता धोखा खा गयी, मान रही अब भूल।
फूलों के बदले वहाँ, मिले आज हैं शूल।६।
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अगले आम चुनाव में, होंगे फिर बदलाव।
देखें किस दल की यहाँ, पार लगेगी नाव।७।
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जिह्वा पर प्रभु नाम हो, लेकिन मन में खोट।
भाषण के बल पर मिलें, जनता के अब वोट।८।
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करें चाकरी देश में, महासुभट विद्वान।
धनवानों की माँद में, बन्धक हैं गुणवान।९।
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निर्धन-श्रमिक किसान के, नहीं समय अनुकूल।
अभी दिखाई दे रहा, मौसम भी प्रतिकूल।१०।
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दिखा नहीं है जेठ में, बदन जलाता घाम।
उमड़-घुमड़कर आ रहे, गरमी में घनश्याम।।
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सावन-भादों में लगें, अच्छी हमें फुहार।
चौमासे में हे प्रभू, कर देना उपकार।११।

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