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रविवार, 17 मई 2015

दोहे "श्रद्धासुमन लिए हुए लोग खड़े हैं आज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अच्छे दिन के स्वप्न तो, हुए बहुत अब दूर।
दाम तेल के बढ़ रहे, महँगाई भरपूर।।
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शक्कर-घी महँगा हुआ, महँगा आटा-तेल।
शासक सत्ता मोह में, खेल रहा है खेल।।
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सबको अच्छे दिनों के, खूब दिखाये स्वप्न।
राज-पाट को पाय कर, सबको किया विपन्न।।
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समझे थे सब लोग यह, होगा कोउ कमाल।
लेकिन हालत देख कर, होता बहुत मलाल।।
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राम-राम के नाम पर, पाया रावणराज।
निर्धनभक्तों के यहाँ, बिगड़े सारे काज।।
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केशर-क्यारी में चली, साठ-गाँठ भरपूर।
पुनर्वास के ख़्वाब़ तो, अब नयनों से दूर।।
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एक साल में देख कर, बदले हुए मिज़ाज़।
श्रद्धासुमन लिए हुए, लोग खड़े हैं आज।।

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