पाल रहा आतंक को, कैसे पाकिस्तान।।
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भारत में पकड़े गये, पाकिस्तानी दूत।
राष्ट्रसंघ को चाहिएँ, कितने और सबूत।।
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इतने पर भी बोलता, पाक झूठ पर झूठ।
जब अच्छा माहौल हो, तब ही जाता रूठ।।
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नाम भले ही पाक हो, हरकत हैं नापाक।
बन्दर देकर घुड़कियाँ, जमा रहा है धाक।।
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हमने करके युद्ध को, दिखा दिया आवेश।
भारत के कारण बना, अलग बाँगलादेश।।
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भारतमाता हाथ में, रखती है त्रिशूल।
टकराने की मत कभी, तुम कर देना भूल।।
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युद्ध हुआ अब यदि कभी, देंगे नाम मिटाय।
फिर से वन्देमातरम, नक्शे में हो जाय।।
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मंगलवार, 26 सितंबर 2017
दोहे "हरकत हैं नापाक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 25 सितंबर 2017
दोहे "माता का गुण-गान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सबको देते प्रेरणा, माता के नवरूप।
निष्ठा से पूजन करो, लेकर दीपक-धूप।।
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सच्चे मन से कीजिए, माता का गुण-गान।
माता तो सन्तान का, ऱखती पल-पल ध्यान।।
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अभ्यागत को देखकर, होना नहीं उदास।
करो प्रेम से आरती, रक्खो व्रत-उपवास।।
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शुद्ध बनाने के लिए, आते हैं नवरात्र।
ज्ञानी बनने के लिए, पढ़ो नियम से शास्त्र।।
सारे सपनों को करें, माता जी साकार।
कर्मों से ही तो बने, जीवन का आधार।।
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ज्ञानदायिनी शारदे, भर दो खाली ताल।
वीणा की झंकार से, कर दो मुझे निहाल।।
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रविवार, 24 सितंबर 2017
दोहे "सुधरेगा परलोक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद।।
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आदिकाल से चल रही, जग में जग की रीत।
वर्तमान ही बाद में, होता सदा अतीत।।
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जीवन आता है नहीं, जब जाता है रूठ।
जर्जर सूखे पेड़ को, सब कहते हैं ठूठ।।
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जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र।
अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।।
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वंशबेल चलती रहे, ऐसा वर दो नाथ।
पितरों का तर्पण करो, भक्ति-भाव के साथ।।
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जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास।
उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।।
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जीवित माता-पिता को, मत देना सन्ताप।
पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप।।
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अच्छे कामों को करो, सुधरेगा परलोक।
नेकी के ही कर्म से, फैलेगा आलोक।।
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बुरा कभी मत सोचिए, करना मत दुष्कर्म।
सेवा और सहायता, जीवन के हैं मर्म।।
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दोहे "माता के नवरात्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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श्राद्ध गये तो आ गये, माता के नवरात्र।
लीला का मंचन करें, रामायण के पात्र।।
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विजयादशमी साथ में, लाती बहु त्यौहार।
उत्सव मानवमात्र के, जीवन का आधार।।
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शरदपूर्णिमा से हुआ, सरदी का आगाज।
दीन किसानों के भरा, घर में खूब अनाज।।
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एक दूसरे से जुड़े, धर्म और ईमान।
चन्द्रकलाओं पर टिका, पर्वों का विज्ञान।।
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करवाचौथ सुहाग का, कितना पावन पर्व।
अपने पतियों पर करे, सभी नारियाँ गर्व।।
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उसके बाद अहोई का, आता है त्यौहार।
माताएँ इस दिन करे, कुलदीपक को प्यार।।
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दीपक यम के नाम का, लोग रहे हैं बाल।
धन्वन्तरि के चित्र पर, चढ़ा रहे जयमाल।।
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संगम पाँचो पर्व का, दीवाली के साथ।
त्यौहारों पर किसी का, खाली रहे न हाथ।।
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गुरुवार, 21 सितंबर 2017
गीत "खतरे में आज सारे तटबन्ध हो गये हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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मतलब पड़ा तो सारे, अनुबन्ध हो गये हैं।
नागों के नेवलों से, सम्बन्ध हो गये हैं।।
बादल ने सूर्य को जब, चारों तरफ से घेरा,
महलों में दिन-दहाड़े, होने लगा अँधेरा,
फिर से घिसे-पिटे तब, गठबन्ध हो गये हैं।
नागों के नेवलों से, सम्बन्ध हो गये हैं।।
सब राज-काज देखा, भोगे विलास-वैभव,
दम तोड़ने लगा जब, तत्सम के साथ तद्भव,
महके हुए सुमन तब, निर्गन्ध हो गये हैं।
नागों के नेवलों से, सम्बन्ध हो गये हैं।।
विश्वासपात्र संगी, सँग छोड़ने लगे जब,
सब ठाठ-बाट उनके, दम तोड़ने लगे तब,
आखेट के अनेकों, प्रतिबन्ध हो गये हैं।
नागों के नेवलों से, सम्बन्ध हो गये है।।
अपनों ने की दग़ा जब, गैरों ने की वफा हैं,
जिनको खिलाये मोदक, वो हो गये खफा हैं,
घर-घर में आज पैदा, दशकन्ध हो गये हैं।
नागों के नेवलों से, सम्बन्ध हो गये हैं।।
जब पाटने चले थे, नफरत की गहरी खाई,
लेकर कुदाल अपने, करने लगे खुदाई,
खतरे में आज सारे, तटबन्ध हो गये हैं।
नागों के नेवलों से, सम्बन्ध हो गये हैं ।।
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बुधवार, 20 सितंबर 2017
गीत "और न अब हिमपात करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सम्बन्धों की दुनियादारी,
अनुबन्धों की बात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।
लक्ष्य नहीं हो जिन राहों में,
कभी न उन पर कदम धरो,
जिनसे औंधे मुँह गिर जाओ,
ऐसी नहीं उड़ान भरो,
रंग-बिरंगी इस दुनिया में,
कभी नहीं उत्पात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।
अपनी बोली, अपनी भाषा,
सबको लगती है प्यारी,
उपवन को धनवान बनाती,
किसिम-किसिम की फुलवारी,
सबके अपने भिन्न वेश है,
ऐसा भारतवर्ष देश है।
पाले की मारी बगिया में,
और न अब हिमपात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।
अन्न जहाँ का खाते हो,
जलपान जहाँ पर करते हो,
अपने काले कृत्यों से,
क्यों उसे कलंकित करते हो,
मानवता की प्राचीरों पर,
अब न कुठाराघात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।
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मंगलवार, 19 सितंबर 2017
दोहे "एकल कवितापाठ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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एकल
कवितापाठ का, अपना ही आनन्द।
रोज़ सृजन को कीजिए, करके कमरा बन्द।१। -- कर खुद ही टिप्पणी, रोज निभाना धर्म। तब आयेगा समझ में, कविताओँ का मर्म।२। -- टिप्पणियों के ढेर से, बन जाता आधार। अपनी रचना बाँचकर, मिलते हैं उपहार।३। -- आम आदमी पिस रहा, मजे लूटता खास। मँहगाई की मार से, मेला हुआ उदास।४। -- प्रियतम भूला आपको, आप कर रहे याद। पत्थर से करना नहीं, कोई भी फरियाद।५। -- कम शब्दों के मेल से, दोहा बनता खास। सरस्वती जी का रहे, सबके उर में वास।६। -- ठगती सबको लालसा, मानव हों या देव। लालच बुरी बलाय है, इससे बचो सदैव।७। -- एक-एक कर सभी की, खोल रहे जो पोल। सही राह बतला रहे, गुणीजनों के बोल।८। -- देश खोखला कर दिया, जीना किया हराम। आम आदमी हो रहे, फोकट में बदनाम।९। -- फिर से पैदा हो गये, बाबर-औरंगजेब। जिनमें उनकी ही तरह, भरे हुए हैं ऐब।१०। -- वाणी में ही निहित हैं, सभी तरह के बोल लेकिन कड़वे बोल से, विष का बनता घोल।११। -- सम्बन्धों की आड़ में, वासनाओं का खेल। करके झूठी प्रशंसा, करते तन का मेल।१२। -- आम आदमी पिस रहा, खास हो रहे मस्त। जाली नोटों ने करी, यहाँ व्यवस्था ध्वस्त।१३। -- सामाजिक परिवेश में, आयी है अब मोच। कुछ लोगों की हो गई, कितनी गन्दी सोच।१४। -- पलकों पर ठहरी हुई. इन्तज़ार की ओस। बिना पिये जो हृदय को, कर देती मदहोश।१५। |
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