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मूषक और विडाल का,
सम्भव होता मेल।।
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जनसेवक ने खो
दिया, गौरव और गुमान।
कदम-कदम पर बिक
रहा, दीन और ईमान।।
--
मारा-मारी सदन
में, होता नित अवरोध।
जनहित के कानून
पर, नेता करें विरोध।।
--
धर्म-जाति के नाम
पर, जद्दोजहद-जिहाद।
इसीलिए तो हो
रहे, दंगे और फसाद।।
--
घर परिवार-समाज
में, स्वस्थ नहीं संवाद।
गरिमा को रख ताख में, लोग करें बकबाद।।
--
नहीं पुरोहित वो
रहे, नहीं रहे यजमान।
छल-बल से हैं तौलते,
ग्राहक को सामान।।
--
वीर और वीरांगना,
सदमे में हैं आज।
अपमानित करता
उन्हें, यह निर्लज्ज समाज।।
--
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शुक्रवार, 26 जुलाई 2019
दोहे "लोग करें बकबाद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 25 जुलाई 2019
दोहे "करगिल विजय दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 23 जुलाई 2019
ग़ज़ल "कभी उम्मीद मत करना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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खिजाओं से बहारों
की, कभी उम्मीद मत करना
घटाओं में
सितारों की, कभी उम्मीद मत करना
भले हों दूर वे
घर से, मगर अपने तो अपने हैं
गैरों से सहारों
की, कभी उम्मीद मत करना
हुए गद्दीनशीं जो
हैं, लुटा भरपूर दौलत को
यहाँ उनसे सुधारों
की, कभी उम्मीद मत करना
गरज से ही डराते
हैं, बरसते जो नहीं बादल
फुहारों की यहाँ
उनसे, कभी उम्मीद मत करना
मजहब के नाम पर
सबको, पढ़ाते पाठ नफरत का
अमन की उन इदारों
से, कभी उम्मीद मत करना
फिदा केशर की
क्यारी पर, यहाँ बहरूपिये कितने
विदेशी चाटुकारों
पर, कभी उम्मीद मत करना
मठों में भ्रष्ट
सन्यासी, जहाँ हो 'रूप' के लोभी
वहाँ अच्छे
विचारों की, कभी उम्मीद मत करना
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सोमवार, 22 जुलाई 2019
ग़ज़ल "नजारा देख मौसम का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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चमन के फूल सहमें
हैं, नजारा देख मौसम का
हुए गमगीन भँवरे
हैं, नजारा देख मौसम का
फलक में हैं बहुत
बादल, नदारत है मगर बारिश
बड़ा हैरान है
माली, नजारा देख मौसम का
करो जैसा-भरो
वैसा, यही कानून कुदरत का
मियाँ हलकान क्यों होते, नजारा देख मौसम का
जफा करके मिलेगा
क्या, यहाँ अहसान का बदला
नजर के सामने
अपनी, नजारा देख मौसम का
मिला जितना उसी का,
शुक्रिया करना नहीं आया
हकीकत तो हकीकत
है, नजारा देख मौसम का
सितारों से नहीं
होती, कभी भी रात रौशन है
अँधेरी रात में
दिलवर, नजारा देख मौसम का
अदब की अंजुमन
में, आज होती ‘रूप’
की पूजा
सुनाते हैं ग़ज़ल
जाहिल, नजारा देख मौसम का
|
रविवार, 21 जुलाई 2019
ग़ज़ल "वही बस पावमानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
वही नदिता कहाती
है, भरी जिसमें रवानी है
धरा की सब दरारों
को, मिटाता सिर्फ पानी है
पनपती बुजदिली
जिसमें, युवा वो हो नहीं सकता
उसी को नौजवां
समझो, भरी जिसमें जवानी है
जहाँ ईमान बिकते
हों, वहाँ सब बात बेमानी
शिकायत और शिकवों
की, वहाँ झूठी कहानी है
इबादत तो जमाने
में, सभी दिन-रात करते हैं
अगर दिल से इबादत
हो, वही बस पावमानी है
मुनाफे के लिए ही
लोग तो, करते तिजारत हैं
सियासत में
तिजारत तो, यहाँ पर खानदानी है
भरी हों खामियाँ
कितनी, बने फिर भी भले-चंगे
हमारी आज भी
फितरत, मगर हिन्दोस्तानी है
बुलन्दी का का
पतन होना, जमाने की रवायत है
छिपी है खण्डहरों
में भी, इमारत की निशानी है
फकत मतलब में
होती है, इनायत लोकशाही में
दिखावे की यहाँ
पर रह गयी, अब मेजबानी है
भरी हैवानियत
कितनी, मनुजता के लिबासों में
जहाँ में 'रूप' पर
होना फिदा, आदत पुरानी है
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आज एक पुरानी गज़ल "इक शामियाना चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सिर छिपाने के लिए, इक शामियाना चाहिए
प्यार पलता हो जहाँ, वो आशियाना चाहिए
राजशाही महल हो, या झोंपड़ी हो घास की
सुख मिले सबको जहाँ, वो घर बनाना चाहिए
दाँव भी हैं-पेंच भी हैं, प्यार के इस खेल में
इस पतंग को, सावधानी से उड़ाना चाहिए
मुश्किलों से है भरी, ये ज़िन्दग़ानी की डगर
आखिरी लम्हात तक, रिश्ता निभाना चाहिए
जोड़ना मुश्किल बहुत है, तोड़ना आसान है
सभ्यता का आचरण, सबको दिखाना चाहिए
चार दिन की चाँदनी है, फिर अँधेरी रात है
घर सभी का रौशनी से, जगमगाना चाहिए
आइना दिल का मिला है, देख गर्दन को झुका
“रूप” के अभिमान को, अपने हटाना चाहिए
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शनिवार, 20 जुलाई 2019
गीत "पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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रंग भी रूप भी छाँव भी धूप भी,
देखते-देखते ही तो ढल जायेंगे।
देश भी भेष भी और परिवेश भी,
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।
ढंग जीने के सबके ही होते अलग,
जग में आकर सभी हैं जगाते अलख,
प्रीत भी रीत भी, शब्द भी गीत भी,
एक न एक दिन तो मचल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।
आप चाहे भुला दो भले ही हमें,
याद रक्खेंगे हम तो सदा ही तुम्हें,
तंगदिल मत बनो, संगदिल मत बनो,
पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।
हर समस्या का होता समाधान है,
याद आता दुखों में ही भगवान है,
दो कदम तुम बढ़ो, दो कदम हम बढ़ें,
रास्ते मंजिलों से ही मिल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।
अब अँधेरों से बाहर भी निकलो जरा,
पथ बुलाता तुम्हें रोशनी से भरा,
हार को छोड़ दो, जीत को ओढ़ लो,
फूल फिर से बगीचे में खिल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।
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