"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

ग़ज़ल "कभी उम्मीद मत करना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खिजाओं से बहारों की, कभी उम्मीद मत करना
घटाओं में सितारों की, कभी उम्मीद मत करना

भले हों दूर वे घर से, मगर अपने तो अपने हैं
गैरों से सहारों की, कभी उम्मीद मत करना

हुए गद्दीनशीं जो हैं, लुटा भरपूर दौलत को
यहाँ उनसे सुधारों की, कभी उम्मीद मत करना

गरज से ही डराते हैं, बरसते जो नहीं बादल
फुहारों की यहाँ उनसे, कभी उम्मीद मत करना

मजहब के नाम पर सबको, पढ़ाते पाठ नफरत का
अमन की उन इदारों से, कभी उम्मीद मत करना

फिदा केशर की क्यारी पर, यहाँ बहरूपिये कितने
विदेशी चाटुकारों पर, कभी उम्मीद मत करना

मठों में भ्रष्ट सन्यासी, जहाँ हो 'रूप' के लोभी
वहाँ अच्छे विचारों की, कभी उम्मीद मत करना

1 टिप्पणी:

  1. बादलों भी इंसानी फितरत में रंग गए है लगता तो यही है
    बहुत अच्छी सामयिक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails