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रविवार, 21 जुलाई 2019

ग़ज़ल "वही बस पावमानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वही नदिता कहाती है, भरी जिसमें रवानी है
धरा की सब दरारों को, मिटाता सिर्फ पानी है

पनपती बुजदिली जिसमें, युवा वो हो नहीं सकता
उसी को नौजवां समझो, भरी जिसमें जवानी है

जहाँ ईमान बिकते हों, वहाँ सब बात बेमानी
शिकायत और शिकवों की, वहाँ झूठी कहानी है

इबादत तो जमाने में, सभी दिन-रात करते हैं
अगर दिल से इबादत हो, वही बस पावमानी है

मुनाफे के लिए ही लोग तो, करते तिजारत हैं
सियासत में तिजारत तो, यहाँ पर खानदानी है

भरी हों खामियाँ कितनी, बने फिर भी भले-चंगे
हमारी आज भी फितरत, मगर हिन्दोस्तानी है

बुलन्दी का का पतन होना, जमाने की रवायत है
छिपी है खण्डहरों में भी, इमारत की निशानी है

फकत मतलब में होती है, इनायत लोकशाही में
दिखावे की यहाँ पर रह गयी, अब मेजबानी है

भरी हैवानियत कितनी, मनुजता के लिबासों में
जहाँ में 'रूप' पर होना फिदा, आदत पुरानी है

1 टिप्पणी:

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