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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

बालगीत-गिलहरी "सबके मन को भाती हो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
बैठ मजे से मेरी छत पर,
दाना-दुनका खाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
 
तुमको पास बुलाने को,
मैं मूँगफली दिखलाता हूँ,
कट्टो-कट्टो कहकर तुमको,
जब आवाज लगाता हूँ,
कुट-कुट करती हुई तभी तुम,
जल्दी से आ जाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
 
नाम गिलहरी, बहुत छरहरी,
आँखों में चंचलता है,
अंग मर्मरी, रंग सुनहरी,
मन में भरी चपलता है,
हाथों में सामग्री लेकर,
बड़े चाव से खाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
 
पेड़ों की कोटर में बैठी
धूप गुनगुनी सेंक रही हो,
कुछ अपनी ही धुन में ऐंठी
टुकर-टुकरकर देख रही हो,
भागो-दौड़ो आलस छोड़ो,
सीख हमें सिखलाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!


1 टिप्पणी:

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