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सोमवार, 8 अगस्त 2016

गीत "जग उसको पहचान न पाता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वो अनुगामी होगा कैसे?
जो सबके पथ का निर्माता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

चन्दा में भी गरमी भर दे,
सूरज को भी शीतल कर दे,
जहाँ न पहुँचे रवि की किरणें,
लेकिन वो पल में हो आता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

वही बहाता गंगा-सागर,
सबकी भरता खाली गागर.
वही सिखाता ढाई आखर,
वही प्यार को है उपजाता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

सबका मालिक वो है एक,
लेकिन उसके नाम अनेक,
वो पूरी दुनिया पहचाने,
जग उसको पहचान न पाता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

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