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शनिवार, 20 अगस्त 2016

गीत "सुमनो को सब नोच रहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चौकीदारी मिली खेत की, अन्धे-गूँगे-बहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

घात लगाकर मित्र-पड़ोसी, धरा हमारी लील रहे,
पर बापू के मौन-मनस्वी, देते उनको ढील रहे,
बोल न पाये, ना सुन पाये, ना पढ़ पाये चेहरो को।।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

कैसे भरे तिजोरी अपनी, दिवस-रैन ये सोच रहे,
अपने पैने नाखूनों से, सुमनो को सब नोच रहे,
गाँवों को वीरान बनाकर, रौशन करते शहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

चीर पर्वतों की छाती को, बहती चंचल धारा है,
गहरी नदिया दूर किनारा, कोई नहीं सहारा है,
चप्पू लेकर दूर खड़े ये, चले थामने लहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

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