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मंगलवार, 9 अगस्त 2016

"एक गीत-एक मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

“खटीमा फाइबर्स” सभागर में
  नववर्ष के आगमन पर
एक कविसम्मेलन का आयोजन किया गया था।
जिसमें मैंने अपनी इन रचनाओं का पाठ किया था।
-एक गीत-
सम्बन्ध आज सारेव्यापार हो गये हैं।
अनुबन्ध आज सारेमनुहार हो गये हैं।।

न वो प्यार चाहता हैन दुलार चाहता है,
जीवित पिता से पुत्रअब अधिकार चाहता है,
सब टूटते बिखरतेपरिवार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारेव्यापार हो गये हैं।।

घूँघट की आड़ में सेदुल्हन का झाँक जाना,
भोजन परस के सबकोमनुहार से खिलाना,
ये दृश्य देखने अबदुश्वार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारेव्यापार हो गये हैं।।

वो सास से झगड़तीससुरे को डाँटती है,
घर की बहू किसी कासुख-दुख न बाटँती है,
दशरथजनक से ज्यादा लाचार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारेव्यापार हो गये हैं।।

जीवन के हाँसिये परघुट-घुट के जी रहे हैं,
माँ-बाप सहमे-सहमेगम अपना पी रहे हैं,
कल तक जो पालते थेअब भार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारेव्यापार हो गये हैं।।
-एक मुक्तक-
गुज़र गया है साल पुरानागाओ फिर से नया तराना,
सिर्फ कलेण्डर ही तो बदलावही ठौर हैवही ठिकाना।
लोग मील के पत्थर जैसेअपनी मंजिल पायें कैसे?
औरों को पथ बतलाते हैंनहीं जानते कदम बढ़ाना।।

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