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बुधवार, 31 अगस्त 2016

दोहे "ओ जालिम-गुस्ताख" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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शोलों के ऊपर अभी, चढ़ी हुई है राख।
भारत का कश्मीर है, भारत का लद्दाख।।
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भूल गये इतिहास को, याद नहीं भूगोल।
बिल्ले भी अब शेर की, रहे बोलियाँ बोल।।
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नाम भले ही पाक हो, मनसूबे नापाक।
कुटिल चाल से हो गया, वाकिफ आज बराक।।
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छलनी को दिखते नहीं, खूद अपने सूराख।।
सिखा रही वो सूप को, आज अदब-अखलाख।।
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जिस शाखा पर घोंसला, काट रहा वो डाल।
कौन बचायेगा उसे, जिसके सिर पर काल।।
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मूरख जब कोशिश करे, बनने की चालाक।
अपने घर की आग से, हो जाता वो ख़ाक।।
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चौमासा मत समझना, जेठ और बैसाख।
चिंगारी मत फेंकना, ओ जालिम-गुस्ताख।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. चौमासा मत समझना, जेठ और बैसाख।
    चिंगारी मत फेंकना, ओ जालिम-गुस्ताख।।
    ....बहुत सटीक .. आग भड़की तो सामने वाला खाक ...

    उत्तर देंहटाएं

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