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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

दोहे "लोकतन्त्र की बात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बेटा उप-अध्यक्ष है, माता है अध्यक्ष।
दोनों मिलकर धो रहे, प्रजातन्त्र के पक्ष।।
--
आजीवन अध्यक्ष हों, जिस कुनबे के तात।
उस दल में बेकार है, लोकतन्त्र की बात।।
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कुटुम-कबीले की चले, मनमानी के साथ।
चार-पाँच ही नाथ हैं, बाकी सभी अनाथ।।
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कुर्सी पर बैठी बहन, सब पर हुक्म चलाय।
ठेकेदारी का चलन, मूरख रहा बनाय।।
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चाय बनाता था कभी, वो है अब सरदार।
भारत माँ का पूत अब, चला रहा सरकार।।
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वसुन्धरा का देश की, जो करता गुणगान।
बन जाता वो एक दिन, जन-गण का भगवान।।
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खिसियानी सब बिल्लियाँ, खम्बा नोचें आज।
समझ गया है कुटिलता, इनकी देश-समाज।।

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