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रविवार, 7 अगस्त 2016

ग़ज़ल "समझदार हो तो समझना इशारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अमन का चमन है वतन ये हमारा।
नही शातिरों का यहाँ है गुजारा।।

खदेड़ा है गोरों को हमने यहाँ से,
लहू दान करके बगीचा सँवारा।

बजे चैन की वंशियाँ मन-सुमन में,
नही हमको हिंसा का आलम गवारा।

दिया पाक को देश का पाक हिस्सा,
अनुज के हकों को नही हमने मारा।

शुरू से सहा आज तक सह रहे हैं,
छोटा समझ कर दिया है सहारा।

दरियादिली बुजदिली मत समझना,
समझदार हो तो समझना इशारा।

हिदायत हमारी है सीमा न लाँघो,
मिटा देंगे पल भर में भूगोल सारा।

दिया "रूप" हमने, भरा रंग हमने, 
तिरंगा बना देंगे हम चाँद-तारा।

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