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शनिवार, 6 अगस्त 2016

दोहे "मित्रता दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हम तो प्रतिदिन माँगते, दुनियाभर की खैर।
अमन-चैन से सब रहें, अपने हों या गैर।।
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जिस पग पर काँटे चुभें, वहाँ न रखना पैर।
जहाँ एक दिन मित्रता, बाकी दिन हो बैर।।
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मतलब की है दोस्तीमतलब का सब प्यार।
मतलब के ही वास्तेहोती है मनुहार।।
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सौ-सौ बार विचारिए, क्या होता है मित्र।
खूब जाँचिए-परखिए, उसका चित्त-चरित्र।।
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हँसी-खेल मत समझिए, दुनिया बड़ी विचित्र।
जीवन में है मित्रता, पावन और पवित्र।।
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जिसको अपना कह दिया, वो जीवनभर मीत।
सच्ची होनी चाहिए, दिल में उपजी प्रीत।।
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आज मित्रता-दिवस पर, कर लेना संकल्प।
मित्र शब्द का है नहीं, दूजा बना विकल्प।।
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उनसे कैसी मित्रता, जो करते हैं घात।
ऐसे लोगों से बचो, जो करते उत्पात।।
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करते मुख के सामने, मीठी-मीठी बात।
होता नहीं कुतर्क से, कोई भी विख्यात।।
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मनवाना जो चाहता, अपनी बात बलात्।
वो दुर्जन करता सदा, सज्जन पर आघात।।
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दुष्ट नहीं माने कभी, धर्म-कर्म उपदेश।
उलटे लगते हैं उसे, उपयोगी सन्देश।।
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बिना विचारे जो करे, वाणी का संधान।
वो मानव के रूप में, साक्षात् हैवान।।

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