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मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

दोहे "सालों का आकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


अपनी सजनी से अगर, पाना चाहो प्यार।
जीवनभर करते रहो, सालों की मनुहार।।

होते हैं ससुराल का, साले ही आधार।
समय-समय पर बाँटिए, सालों को उपहार।।

घर का हो गर चाहते, आप शान्त परिवेश।
धन पर करने दीजिए, निज सालों को ऐश।।

साधारण से हों अगर, जीजा के परिधान।
मिलता है ससुराल में, बस उसको अपमान।।

अगर देखना चाहते, दुनिया में मक्कार।
मन में आये उभर कर, सालों का आकार।।

जीवन अपना ढालिए, सालों के अनुसार।
सालों से करना नहीं, नोंक-झोंक-तकरार।।

सतयुग या कलिकाल हो, कहता जीवन शास्त्र।
साले जीजा के लिए, रहे दया के पात्र।।

रूप सुहाना हो भले, आदत में हैं कंस।
बगुलों को तो भूल से, समझ न लेना हंस।।

खान-पान में चाहिए, रोगी को अनुपान।
बिन अनुभव बेकार है, दुनियाभर का ज्ञान।।

2 टिप्‍पणियां:

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