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बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

दोहागीत "बेटों जैसे दीजिए, बेटी को अधिकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बेटी से आबाद हैंसबके घर-परिवार।
बेटों जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।

दुनिया में दम तोड़तामानवता का वेद।
बेटा-बेटी में बहुतजननी करती भेद।।
बेटा-बेटी के लिएहों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार सेपार लगाओ नाव।।
माता-पुत्री-बहन काकभी न मिलता प्यार।
बेटों जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।

पुरुषप्रधान समाज मेंनारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भलाकैसे हो उत्कर्ष।।
कृष्णपक्ष की अष्टमीऔर कार्तिक मास।
जिसमें पुत्रों के लिएहोते हैं उपवास।।
ऐसे रीति-रिवाज कोबार-बार धिक्कार।
बेटों जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।

जिस घर में बेटी रहेसमझो वे हरिधाम।
दोनों कुल का बेटियाँकरतीं ऊँचा नाम।।
कुलदीपक की खान कोदेते क्यों हो दंश।
बिना बेटियों के नहीं, चल पायेगा वंश।।
अगर न होती बेटियाँथम जाता संसार।
बेटों जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।

लुटे नहीं अब देश मेंमाँ-बहनों की लाज।
बेटी को शिक्षित करोउन्नत करो समाज।।
एक पर्व ऐसा रचोजो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ मेंकरो स्वयं पर गर्व।।
सेवा करने में कभीसुता न माने हार।
बेटों जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।

माता बनकर बेटियाँदेतीं जग को ज्ञान।
शिक्षित माता हों अगरशिक्षित हों सन्तान।।
संविधान में कीजिएअब ऐसे बदलाव।
माँ-बहनों के साथ मैंबुरा न हो बर्ताव।।
क्यों पुत्रों की चाह मेंरहे पुत्रियाँ मार।
बेटों जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 12-10-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2755 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 12-10-2017 को प्रकाशनार्थ 818 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर सीख देती रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेटीं राग यमन की तानें, घुँघरु की रुनझुन हैं
    इकतारा की मीठी मीठी, अलबेली सी धुन हैं।

    अतीव सुंदर कविवर। सार्थक रचना और वो भी संतुलित छंद में रचने में आपका कोई उत्तर नहीं। अप्रतिम

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही लाजवाब....
    एक पर्व ऐसो रचो, जो हो पुत्री पर्व....
    वाह!!!

    उत्तर देंहटाएं

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