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गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

दोहे "चलना कछुआ चाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उपवन में काँटे उगे, चलना कदम सम्भाल।
प्यार-प्रीत की राह में, चलना कछुआ चाल

चारों ओर बिछा हुआ, बहेलियों का जाल।
थर्राता है गात तब, जब आता भूचाल।।

भट्टी में तपकर बने, लोहा भी फौलाद।
सुख-दुख दोनों में करो, परमपिता को याद।।

अपने मतलब के लिए, लोग कर रहे काम।
कामुकता की बाढ़ से, प्यार हुआ बदनाम।

सीमा कभी न लाँघिए, कहते हैं सब शास्त्र।
धोखा देते समय पर, जग में ओछे पात्र।।

मत समझो इस देश को, अमरीका-जापान।
पहनो ऊट-पटाँग मत, नवयुवकों परिधान।।

चप्पू का मझधार में, छोड़ न देना साथ।
जिससे प्रीत निभा सको, पकड़ो उसका हाथ।

नाव और पतवार से, सीखो जीवन ढंग।
पार उतरने के लिए, मिलकर रहना संग।।

2 टिप्‍पणियां:

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