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बुधवार, 3 जून 2020

दोहे "मन हो गया विभोर" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

पहली बारिश
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छम-छम बूँदें पड़ रहीं, दादुर करते शोर।
इन्द्रधनुष को देखकर, मन हो गया विभोर।१।
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कल तक गरमी थी बहुत, मन था बड़ा उदास।
आज व्योम के नीर से, बुझी धरा की प्यास।२।
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बारिस का जलपान कर, आम हो गये खास।
पक जायेंगे आम जब, देंगे मधुर मिठास।३।
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एक दिवस में हो गया, मौसम में बदलाव।
धरती के भरने लगे, धीरे-धीरे घाव।४।
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झुलसे लू की मार से, मैदानी परिवेश।
हरी-हरी अब घास का, होगा नया निवेश।५।
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पशुओं को चारा मिले, इंसानों को अन्न।
बारिश आने से सभी, होंगे अब सम्पन्न।६।
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अपनी धुन में मगन हो, बया बुन रही नीड़।
नभ में घन को देख कर, हर्षित काफल-चीड़।७।
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जलभराव से नगर का, बदल गया भूगोल।
पहली बारिश में खुली, शासन की सब पोल।८।
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पुरवैया के साथ में, पड़ने लगी फुहार।
सूखे बाग-तड़ाग में, आया नया निखार।९।
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सुख़नवरों ने कर दिये, लिखने शुरू कलाम।
मजदूरों को मिल गया, खेतों में अब काम।१०।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 4.6.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3722 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  2. छम- छम बूँदे पड़ रही .. अति सुंदर ।

    जवाब देंहटाएं

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