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गुरुवार, 4 जून 2020

गीत "पर्यावरण का नियन्ता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।
बहुत आभार है उसकाबहुत उपकार है उसका,
दिया माटी के पुतले कोउसी ने प्राण प्यारा है।।
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बहाई ज्ञान की गंगामधुरता ईख में कर दी,
कभी गर्मीकभी वर्षाकभी कम्पन भरी सरदी।
किया है रात को रोशनदिये हैं चाँद और तारे,
अमावस को मिटाने कोदियों में रोशनी भर दी।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।
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लगा जब रोग का सदमातो उसने ही दवा दी है,
कुहासे को मिटाने कोउसी ने तो हवा दी है।
जो रहते जंगलों मेंभीगते बारिश के पानी में,
उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।
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सुबह और शाम को मच्छर, सदा गुणगान करते हैं,
जगत के उस नियन्ता कोसदा प्रणाम करते हैं।
मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
विपत्ति जब सताती हैनमन शैतान करते है।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (05-06-2020) को
    "मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है," (चर्चा अंक-3723)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"



    जवाब देंहटाएं
  2. प्रकृति की कृपा
    सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं

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