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सोमवार, 29 जून 2020

ग़ज़ल "फूल हो गये अंगारों से" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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कहना है ये दरबारों से 
पेट नहीं भरता नारों से
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सूरज-चन्दा में उजास है
काम नहीं चलता तारों से
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आम आदमी ऊब गया है
आज दोगले किरदारों से
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दरिया पार नहीं होता है
टूटी-फूटी पतवारों से
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कोरोना की बीमारी में
रौनक गायब बाजारों से
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ईँधन पर महँगाई क्यों है
लोग पूछते सरकारों से
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जनसेवक मनमानी करते
वंचित जनता अधिकारों से
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नहीं पिघलता दिल दुनिया का
मजदूरों की मनुहारों से
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क्या होती है आग पेट की
कोई पूछे लाचारों से
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हरियाली अभिशाप बन गयी
फूल हो गये अंगारों से
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बदल गया क्यों 'रूप' वतन का
पूछ रहे सब सरदारों से
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6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उत्तम ...
    हर शेर कमाल है ... दूर की बात सहज कहता हुआ ...

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब शास्त्री जी, आपके ये दोहे हमारी थाती हैं...क्या होती है आग पेट की
    कोई पूछे लाचारों से
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    हरियाली अभिशाप बन गयी
    फूल हो गये अंगारों से...वाह

    जवाब देंहटाएं
  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-6-2020 ) को "नन्ही जन्नत"' (चर्चा अंक 3748) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर ,एक एक दोहे मन को झकझोरता हुआ ,सादर नमन सर

    जवाब देंहटाएं
  5. हरियाली अभिशाप बन गयी
    फूल हो गये अंगारों से.. वाह बेहतरीन रचना आदरणीय

    जवाब देंहटाएं
  6. उत्कृष्ट सृजन सुंदर भाव आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं

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