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शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

बालकविता "अमरूद गदराने लगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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आ गई बरसात तो,
अमरूद गदराने लगे।
स्वच्छ जल का पान कर,
डण्ठल पे इतराने लगे।।
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डालियों पर एक से हैं,
रंग में और रूप में।
खिल रहे इनके मुखौटे,
गन्दुमी सी धूप में।।
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कुछ हैं छोटे. कुछ मझोले,
कुछ बड़े आकार के।
मौन आमन्त्रण सभी को,
दे रहे हैं प्यार से।
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किसी का मन है गुलाबी,
और किसी का है धवल।
पीत है चेहरा किसी का,
और किसी का तन सबल।।
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स्वस्थ रहने के लिए,
खाना इसे वरदान है।
नाम का अमरूद है,
लेकिन गुणों की खान है।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. मान्यवर ! शुक्रगुज़ार हूँ आपका आप अपना समय निकालकर हौसला बढ़ाते रहे मैं देख न सका ,अब गलती दुरुस्त करता हूँ।



    स्वस्थ रहने के लिए,
    खाना इसे वरदान है।
    नाम का अमरूद है,

    लेकिन गुणों की खान है।।
    जी हाँ एक वैज्ञानिक अध्ययन में १४ फलों का अध्ययन विश्लेष्ण करने पर अमरुद पहल पायदान पे बैठा मिला ,पाइनेपल आखिरली ,अनार दोयम ,...... एपिल चौथे पे।
    आपने सच ही अमरुद का मानवी -करण किया है ,एक साम्य देखिये :
    कुछ हैं छोटे. कुछ मझोले,
    कुछ बड़े आकार के।
    मौन आमन्त्रण सभी को,
    दे रहे हैं प्यार से।पहना दो इनको सभी को चोलियां ,खुश रहेंगी सदा ही हमझोलियाँ।
    blogpaksh.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  2. आ डॉ रूप चंद शास्त्री "मयंक" सर, नमस्ते 🙏!आपने सरल शब्दों में बालकों के लिए सहज बोधगम्य रचना प्रस्तुत की है। इससे बाल कविता कैसे लिखी जाय, इसका यह बहुत सुन्दर उदाहरण है।
    हार्दिक साधुवाद !--ब्रजेंद्र नाथ

    जवाब देंहटाएं

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