-- पागल
तो हो सकता हूँ, पर
डरा हुआ नही हो सकता हूँ। निद्रा
में हो सकता हूँ, पर
मरा हुआ नही हो सकता हूँ।। जो
परिवेशों में घटता है, उसको
ही मैं गाता हूँ। गूँगे-बहरे
इस समाज को, लिख-लिखकर
समझाता हूँ।। अच्छा
तो हो सकता हूँ, पर
बहुत बुरा नही हो सकता।। निद्रा
में हो सकता हूँ, पर
मरा हुआ नही हो सकता हूँ।। -- चाहे कितने गाल बजा लो, यह जीवन तो नश्वर है। कितने ही अरमान सजा लो, कर्ता-धर्ता ईश्वर है।। मैं तो एक अधूरा घट हूँ, भरा नहीं हो सकता हूँ। निद्रा
में हो सकता हूँ, पर
मरा हुआ नही हो सकता हूँ।। मैं
दरख़्त का पीला पत्रक, मद्धम
सुर में गाता हूँ। भोजन
का अम्बार लगा है, फिर
भी मैं नही खाता हूँ।। लगीं
सूखने शाखाएँ तो, हरा
नही हो सकता हूँ।। निद्रा
में हो सकता हूँ, पर
मरा हुआ नही हो सकता हूँ।। -- |
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वाह! चेतन सत्ता की चिर पुकार
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