निलय से अज्ञान के तम को भगाओ। ज्ञान का इक दीप मन्दिर में जलाओ।। मन स्वदेशी है, स्वदेशी खाद-पानी चाहिए, नीर में सरिताओं के अविरल रवानी चाहिए, नौजवानों में समन्दर सी जवानी चाहिए, बंजर धरा को उर्वरा फिर से बनाओ। ज्ञान का इक दीप मन्दिर में जलाओ।। शेर के मानिन्द बनकर अब दहाड़ो, दुश्मनों को युद्ध-भूमि में पछाड़ो, देश से आतंक को जड़ से उखाड़ो, सुप्त मन में आस का अंकुर उगाओ। ज्ञान का इक दीप मन्दिर में जलाओ।। सहन मत करना कभी अपमान को, भूलते हो क्यों पुरानी शान को, छोड़ दो कर्कश विदेशी गान को, प्यार के मृदुगान को अब गुनगुनाओ। ज्ञान का इक दीप मन्दिर में जलाओ।। भाईचारा-अमन हो अपने वतन में, आस के अंकुर उगाना है चमन में, कामना कल्याण की करना हवन में, नेकियों का नित्य गुलदस्ता सजाओ। ज्ञान का इक दीप मन्दिर में जलाओ।। बन सको तो, नारियल जैसे बनो, हो सके तो सुमन से परमल बनो, कुटिलता को छोड़कर कोमल बनो, सभ्यता का “रूप” दुनिया को दिखाओ। ज्ञान का इक दीप मन्दिर में जलाओ।। |
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सुंदर संदेश
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रेरक गीत
जवाब देंहटाएंसमयोचित सार्थक आह्वान!
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