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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009
दामाद बहुत ही भाता है। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)
यम का दूत कहाता है।
सास-ससुर की छाती पर,
बैठा रहता जामाता है।।
खाता भी, गुर्राता भी है,
सुनता नही सुनाता है।
बेटी को दुख देता है तो,
सीना फटता जाता है।।
चंचल अविरल घूम रहा है ,
ठहर नही ये पाता है।
धूर्त भले हो किन्तु मुझे,
दामाद बहुत ही भाता है।।
रोचक कविता.
जवाब देंहटाएंwaah bahut khub
जवाब देंहटाएंदामाद दसवां ग्रह है जो बाकी के नौ ग्रहों पर भारी है।
जवाब देंहटाएंबहुत ही शानदार व्यंग है शाश्त्री जी. दामाद वो चीज है जो ना खाते बने ना उगलते बने.
जवाब देंहटाएंरामराम.
क्या करिएगा शास्त्री जी, यह भी रीति-रिवाजों के जूते का असर है.
जवाब देंहटाएंखुद तो घूम रहा है अविरल,
जवाब देंहटाएंठहर नही ये पाता है।
धूर्त भले हो किन्तु मुझे,
दामाद बहुत ही भाता है।।
दामाद किसे नही भायेगा..
अच्छी रचना. हास्य का पुट भी. और लक्ष्य पर सधा सटीक निशाना ..
marmik hai. Badhaai ho
जवाब देंहटाएंmarmik hai. Badhaai ho.
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