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गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

"पिछले वर्ष आज ही के दिन मैं अनाथ हो गया था" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"माँ आपको कभी नहीं भुला पाऊँगा"
पिछले वर्ष आज के ही दिन
आपका भौतिक शरीर 
पञ्चतत्व में विलीन हो गया था।
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माँ ममता का रूप है, पिता सबल आधार।
मात-पिता सन्तान को, करते प्यार अपार।।
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बचपन मेरा खो गयाहुआ वृद्ध मैं आज।
सोच-समझकर अब मुझे, करने हैं सब काज।।
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जब तक मेरे शीश पररहा आपका हाथ।
लेकिन अब आशीष काछूट गया है साथ।।
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तारतम्य टूटा हुआ, उलझ गये हैं तार।
कौन करेगा अब मुझे, पिता सरीखा प्यार।।
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सूना सब संसार है, सूना घर का द्वार।
मात-पिता बिन हो गये, फीके सब त्यौहार।।
--
तात मुझे बल दीजिएउठा सकूँ मैं भार। 
एक-नेक बनकर रहेमेरा ये परिवार।।
--
    अब मुझे लगने लगा है कि मैं बुजुर्ग हो गया हूँ। एक साल भी पूरा नहीं हुआ और पूज्या माता जी और पिता जी दोनों का ही क्षत्रछाया से मैं वंचित हो गया।
    विगत वर्ष 29 जुलाई, 2014 को ढाई साल अस्वस्थ रहने के बाद पूज्य पिताश्री घासी राम जी परलोक सिधार गये थे। मगर मन में यह सन्तोष था कि पूज्या माता जी का शुभआशीष तो मुझे मिल ही रहा है।
     2 मार्च, 2015 को पूज्या माता जी मेरे साथ कार में बैठकर स्थानीय पंजाव नैशनल बैंक में खाता खोलने के लिए गयीं थी। क्योंकि पिता जी के देहान्त के बाद इंण्डेन गैस का का खाता उनके नाम आ गया था। इसलिए गैस के खाते बैंक को में संलग्न कराना जरूरी था।
      3 मार्च को माता जी के एक पाँव में असह्यनीय पीड़ा शुरू हो गयी थी। और वो चलने फिरने में असमर्थ हो गयीं थी। उसके बाद स्थानीय जमुना अस्पताल के डॉ. सी. एस जोशी द्वारा उनका इलाज चला, पाँव का दर्द तो ठीक हुआ मगर दोनों पाँव में सूजन बढ़ती चली गयी। 
      25 दिन के बाद सौरभ अस्पताल के डॉ. प्रेम सिंह को घर बुला कर माता जी को दिखाया। क्योंकि सूजन उनके चेहरे और हाथों में भी आ गयी थी। उन्होंने 5 टेस्ट लिखे और उनके ही निर्देश पर पैथौलॉजी के टैक्नीशियन को घर बुलाकर लाया। वो टैस्ट के लिए जरूरी खून और मूत्र आदि जाँच के लिए ले गया।
     टैस्ट की सभी रिपोर्ट सामान्य निकलीं। डॉ. साहब ने कहा कि सब कुछ ठीक है लेकिन खून की बहुत कमी है। इन्हें हर दो घण्टे के अन्तराल पर कुछ न कुछ खिलाते रहिए। मगर माता जी की इच्छा तो खाने की होती ही नहीं थी।
     10 अप्रैल से उनकी हालत गम्भीर होने लगी थी और 11 से उन्हों ने नाक से श्वाँस लेना बन्द कर दिया था।
    12 अप्रैल को जब उनकी हालत ज्यादा खराब हुई तो 12 अप्रैल को सारे सम्बन्धियों को फोन कर दिये गये। 13 तारीख को लगभग सभी रिश्तेदार माता जी को देखने के लिए आ चुके थे। मगर 13 तारीख को सुबह 9 बजे से माता जी की स्थिति में बहुत सुधार होने लगा था। हमें ऐसा आभास भी होने लगा था कि अब माता जी जल्दी ही ठीक हो जायेंगी। एक दो रिश्तेदारों ने तो कहा कि माता जी तो ठीक हैं आपने फोन करने में जल्दी कर दी डॉक्टर साहब।
      रात का खाना सब रिश्तेदारों के साथ बहुत प्रेम से खाया। उसके बाद आइस क्रीम के 15 कप सबके लिए मँगाये गये और एक छोटा कप माता जी के लिए भी लाया गया।
माता जी ने 2-3 चम्मच आइस क्रीम भी चाटी मगर उनको निगलने में तकलीफ हो रही थी।
      रात्रि 9-45 पर अचानक घर के लोगों की चीख-पुकार मुझे सुनाई दी और मैं दौड़ कर माता जी के पास गया तो उनकी श्वाँस वापिस लौट आयी थी। वो फिर से सामान्य लगने लगीं थी। अब मुझे भी तसल्ली हो गयी थी और मैंने मन में सोचा कि रिश्तेदारों को कोई भ्रम रहा होगा। मैं माता जी का इकलौता  पुत्र होने हूँ और माता जी मुझे बहुत प्यार करतीं थी। थोड़ी बाद माता जी कहा कि रूपचन्द को बुलाओ।
      मैं उनके पास गया और उनसे पूछा- “माँ आपको बैठा दूँ क्या?”
माता जी ने कहा- “हाँ”
      मैंने अपना सहारा देकर माता जी को बैठा दिया थोड़ी देर बाद मैंने उनसे पूछा- “माता जी! आपको लेटा दूँ क्या”
      उन्होंने कहा- “नहीं”
       लेकिन थोड़ी देर बाद ही मेरी गोद में उनकी आँखें फैल गयीं और मुँह खुल गया। तब मैंने उनके कान में जोर-जोर से कहा कि माता जी अभी छोटी बहन विजय लक्ष्मी आ रही है 15 मिनट में पहुँच जायेगी। अभी जाना नहीं “माँ”!
ग़ज़ब की इच्छा शक्ति थी माता जी की। उनकी श्वाँस फिर से चलने लगी थी। होठ फड़फड़ाने लगे थे।
        उनकी वाणी ने अन्तिम समय तक भी उनका साथ नहीं छोड़ा था।
        रात्रि 11-20 पर छोटी बहन और बहनोई आ गये। उस समय तक माता जी के होठ हिल रहे थे। बहन ने माता जी की पीठ सहलाई और माता जी हमेशा के लिए इस लोक से विदा हो गयीं।
       शेष सभी रिश्तेदार 14 अप्रैल की दोपहर 11-30 तक बाकी सभी रिश्तेदार भी आ चुके थे।
    माता जी का विमान खूब सजाया गया और उस पर लेटाकर स्थानीय मुक्तिधाम की ओर हम सब लोग चल पड़े।
       8 किलो  देशी घी, 15 किलो हवनसामग्री, चन्दन, 5 किलो मेवा-मिष्ठान, साढे पाँच कुण्टल लकड़ियाँ और 50 किलो कण्डे के साथ स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वार लिखित संस्कार-पद्धति से वेद मन्त्रों के घी-सामग्री की आहुतियाँ लगाकर माता जी का अन्तिम संस्कार किया गया।
      अब चार दिनों तक प्रातः-सायम् घर में यज्ञ किया और पूज्या माता जी आत्मा की सद्गति / शान्ति की प्रार्थना परमपिता परमात्मा की।
    सुबह 16 अप्रैल को फूल चुनने के लिए सुबह 6 बजे मैं अपने प्रपौत्र और पुत्रों के साथ मुक्तिधाम गया।
     17 अप्रैल, 2015 (शक्रवार) को प्रातः 10 बजे से विशेष बृहत् यज्ञ होगा उसके बाद रस्म पगड़ी और श्रद्धांजलि का कार्यक्रम रखा गया था। तत्पश्चात ब्रहमभोज का भी आयोजन किया गया था।
मैंं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि
मुझे हर जन्म में आपको ही 
माता के रूप में दें।

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