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शनिवार, 23 अप्रैल 2016

दोहे "पुस्तक-दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पढ़े-लिखे करते नहीं, पुस्तक से सम्वाद।
इसीलिए पुस्तक-दिवस, नहीं किसी को याद।।
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पुस्तक उपयोगी नहीं, बस्ते का है भार।
बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।।
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अभिरुचियाँ समझे बिना, पौध रहे हैं रोप।
नन्हे मन पर शान से, देते कुण्ठा थोप।।
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बालक की रुचियाँ समझ, देते नहीं सुझाव।
बेमतलब की पुस्तकें, भर देंगी उलझाव।।
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शिक्षामन्त्री हो जहाँ, स्नातक से भी न्यून।
कैसे हों लागू वहाँ, हितकारी कानून।।
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पाठक-पुस्तक में हमें, करना होगा न्याय।
पुस्तक-दिन हो सार्थक, ऐसा करो उपाय।।

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