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मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

गीत "मक्कारों के वारे-न्यारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आयेगा इस वर्ष भी, नया-नवेला साल।
आशाएँ फिर से जगीं, सुधरेंगे अब हाल।।
--
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
गधे चबाते हैं काजू,
महँगाई खाते बेचारे!!

काँपे माता काँपे बिटियाभरपेट न जिनको भोजन है,
क्या सरोकार उनको इससेक्या नूतन और पुरातन है,
सर्दी में फटे वसन फटे सारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

जो इठलाते हैं दौलत परवो खूब मनाते नया-साल,
जो करते श्रम का शीलभंग,वो खूब कमाते द्रव्य-माल,
भाषण में केवल हैं नारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

नव-वर्ष हमेशा आता हैसुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाईकितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

रोटी-रोजी के संकट मेंनही गीत-प्रीत के भाते हैं,
कहने को अपने सारे हैंपर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

टूटा तन-मन भी टूटा हैअभिलाषाएँ बस जिन्दा हैं,
आयेगीं जीवन में बहारयह सोच रहा कारिन्दा हैं,
कब चमकेंगें नभ में तारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच गरीब गुरबों के लिए क्या नया क्या पुराना साल
    बहुत अच्छी सामयिक चिंतन

    उत्तर देंहटाएं

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