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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

गीत "बिखर गया ताना-बाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सन्नाटा पसरा है अब तो,
गौरय्या के गाँव में।
दम घुटता है आज महल की,
ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।

नहीं रहा अब समय सलोना,
बिखर गया ताना-बाना,
आगत का स्वागत-अभिनन्दन,
आज हो गया बेगाना,
कंकड़-काँटे चुभते अब तो,
पनिहारी के पाँव में।
दम घुटता है आज महल की,
 ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।

परम्परा के गीत नहीं हैं,
अब अपने त्यौहारों में,
भुला दिये है देशी व्यञ्जन,
पूरब के आहारों में,
दबा सुरीला कोयल का सुर,
अब कागा की काँव में।
दम घुटता है आज महल की,
 ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।

घास-फूँस के माटी के घर,
अब तो नजर नहीं आते,
खेत-बाग-वन आज घरा पर,
दिन-प्रतिदिन घटते जाते,
खोज रहे हैं शीतल छाया,
कंकरीट की ठाँव में।
दम घुटता है आज महल की,
 ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद ब्लॉग पर 'शनिवार' ३० दिसंबर २०१७ को लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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  2. दम घुटता है आज महल की ठंडी -ठंडी छांव में

    उत्तर देंहटाएं
  3. जिंदगी के सफ़र में पढ़ावों से गुज़रता एक व्यवहारिक गीत।
    बधाई एवं शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. जिंदगी के सफ़र में पढ़ावों से गुज़रता एक व्यवहारिक गीत।
    बधाई एवं शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आदरणीय आपकी रचनाएँ सदा की तरह विशेषता लिये अपनी छाप छोड़ती हैं

    उत्तर देंहटाएं

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