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शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

दोहे "परिवेश" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

परिवेश पर विविध दोहे
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उच्चारण सुधरा नहीं, बना नहीं परिवेश।
अँगरेजी के जाल में, जकड़ा सारा देश।१।
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अपना भारतवर्ष है, गाँधी जी का देश।
सत्य-अहिंसा के यहाँ, मिलते हैं सन्देश।२।
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लड़की लड़का सी दिखें, लड़के रखते केश।
पौरुष पुरुषों में नहीं, दूषित है परिवेश।३।
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भौतिकता की बाढ़ में, घिरा हुआ है देश।
फैशन की आँधी चली, बिगड़ गया है वेश।४।
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हरकत से नापाक की, बिगड़ रहा परिवेश।
सीमा पर घुसपैठ को, झेल रहा है देश।५।
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नहीं बड़ा है देश से, भाषा-धर्म-प्रदेश।
भेद-भाव की भावना, पैदा करती क्लेश।६।
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प्यार और सदभाव के, थोथे हैं सन्देश।
दाँव-पेंच के खेल में, चौपट हैं परिवेश।७।
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खुद जलकर जो कर रहा, आलोकित परिवेश।
नन्हा दीपक दे रहा, जीवन का सन्देश।८।
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सूफी-सन्तों ने दिया, दुनिया को उपदेश।
अपने प्यारे देश का, निर्मल हो परिवेश।९।
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रखना होगा अमन का, भारत में परिवेश।
मत-मजहब से है बड़ा, अपना प्यारा देश।१०।
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4 टिप्‍पणियां:


  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२८ -१२-२०१९ ) को "परिवेश" (चर्चा अंक-३५६३) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. खुद जलकर जो कर रहा, आलोकित परिवेश।
    नन्हा दीपक दे रहा, जीवन का सन्देश।

    एक सुंदर संदेश देती रचना ,सादर नमस्कार सर

    जवाब देंहटाएं

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