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रविवार, 29 दिसंबर 2019

गीत "कब चमकेंगें नभ में तारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
जनसेवक खाते हैं काजू,
महँगाई खाते बेचारे!!
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काँपे माता-काँपे बिटियाभरपेट न जिनको भोजन है,
क्या सरोकार उनको इससेक्या नूतन और पुरातन है,
सर्दी में फटे वसन फटे सारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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जो इठलाते हैं दौलत परवो खूब मनाते नया-साल,
जो करते श्रम का शीलभंगवो खूब कमाते द्रव्य-माल,
भाषण में हैं कोरे नारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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नव-वर्ष हमेशा आता हैसुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाईकितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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रोटी-रोजी के संकट मेंकुछ दूर देश में जाते हैं,
कहने को अपने सारे हैंपर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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टूटा तन-मन भी टूटा हैअभिलाषाएँ बस जिन्दा हैं,
आयेगीं जीवन में बहारयह सोच-सोच शरमिन्दा हैं,
कब चमकेंगें नभ में तारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ...
    बहुत ही लाजवाब गीत ... व्यंग की तीखी धार ...
    नव वर्ष की मंगल कामनाएं ...

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (30-12-2019) को 'ढीठ बन नागफनी जी उठी!' चर्चा अंक 3565 पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं…
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं

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