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शनिवार, 28 दिसंबर 2019

गीत "गौरय्या का गाँव" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



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सन्नाटा पसरा है अब तो,
गौरय्या के गाँव में।
दम घुटता है आज चमन की,
ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।
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नहीं रहा अब समय सलोना,
बिखर गया ताना-बाना,
आगत का स्वागत-अभिनन्दन,
आज हो गया बेगाना,
कंकड़-काँटे चुभते अब तो,
पनिहारी के पाँव में।
दम घुटता है आज चमन की,
 ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।
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परम्परा के गीत नहीं हैं,
अब अपने त्यौहारों में,
भुला दिये है देशी व्यञ्जन,
पूरब के आहारों में,
दबा सुरीला कोयल का सुर,
अब कागा की काँव में।
दम घुटता है आज चमन की,
 ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।
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घास-फूँस के माटी के घर,
अब तो नजर नहीं आते,
खेत-बाग-वन आज घरा पर,
दिन-प्रतिदिन घटते जाते,
खोज रहे हैं शीतल छाया,
कंकरीट की ठाँव में।
दम घुटता है आज चमन की,
 ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. दबा सुरीला कोयल का सुर,
    अब कागा की काँव में।
    दम घुटता है आज चमन की,
    ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।

    सच तो यह भी है कि अब कागा की काँव-काँव भी बमुश्किल सुनाई देती है

    खोज रहे हैं शीतल छाया,
    कंकरीट की ठाँव में।
    दम घुटता है आज चमन की,
    ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।

    सच कंक्रीट के घरों में दिल भी उसी जैसा हो गया है

    बदलते परिवेश की कसक कलम की छटपटाहट बोल ही देती हैं

    बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं

  2. जी नमस्ते,



    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(२९-१२ -२०१९ ) को " नूतनवर्षाभिनन्दन" (चर्चा अंक-३५६४) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं

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