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शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

दोहे, "मकर संक्रान्ति-विविधताओं में एकता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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उत्तरायणी पर्व को, ले आया नववर्ष।
तन-मन में सबके भरा, कितना नूतन हर्ष।।
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मकर राशि में आ गये, अब सूरज भगवान।
नदिया में स्नान कर, करना रवि का ध्यान।‍।
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भारत में इस पर्व के, अलग-अलग हैं नाम।
विविधताओं में एकता, सुन्दर-सुखद-ललाम।।
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चारों ओर भरा हुआ, लोगों में उल्लास।
सुधरेगा परिवेश अब, सबको यह विश्वास।।
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घट जायेगी देश में, अब सर्दी की मार।
उपवन में आ जायेगा, नैसर्गिक सिंगार।।
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कलाबाजियाँ कर रहीं, उड़तीं हुई पतंग।
बिखराती आकाश में, भाँति-भाँति के रंग।।
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वसुन्धरा सजने लगी, कर सोलह सिंगार।
भारतमाता को करो, सच्चा-सच्चा प्यार।।
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तन को भी निर्मल करो, मन के हरो विकार।
गंगासागर दे रहा, पूजा का अधिकार।।
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अब भँवरे करने लगे, उपवन में गुंजार।
कलियों में होने लगा, यौवन का संचार।।
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पीताम्बर को ओढ़कर, घूम रहा है सन्त।
बासन्ती परिवेश में, सजने लगा बसन्त।।
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शंकर जी भी चल दिये, मैदानों की ओर।
निर्मल हो मन्दाकिनी, कल-कल करती शोर।।
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माता-पिता बुजुर्ग का, हरदम करना मान।
ज्ञानसिन्धु आचार्य का, करना मत अपमान।।
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नहीं बड़ा है देश से, भाषा-धर्म-प्रदेश।
भेद-भाव की भावना, पैदा करती क्लेश।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति। मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  2. बहुत खूबसूरत सृजन मकर-संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर सृजन।
    सादर प्रणाम

    जवाब देंहटाएं

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